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कन्या राशि के लिए संतान योग — पुत्र-पुत्री प्राप्ति विचार

कन्या राशि के लिए संतान योग — पुत्र-पुत्री प्राप्ति विचार

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कन्या राशि वालों के लिए संतान योग: एक शास्त्रीय एवं संवेदनशील विश्लेषण ज्योतिष शास्त्र में संतान योग का अत्यंत महत्व है। यह केवल सांसारिक सुख का विषय नहीं, अपितु आत्मिक उत्तरदायित्व का भी प्रतीक है। जब कुंडली में 5वाँ भाव और उसके स्वामी के साथ-साथ गुरु एवं सप्तमेश की स्थिति बलवान होती है, तभी संतान योग फलित होता है। कन्या राशि वालों के लिए यह विश्लेषण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस राशि के स्वभाव, बुद्धि एवं व्यवहारिक दृष्टिकोण का सीधा संबंध संतान सुख से जुड़ता है। संतान योग के निर्माण में 5वाँ भाव सर्वाधिक निर्णायक होता है। यह भाव मनोरंजन, बुद्धि, धर्म, संतान एवं पूर्व जन्म के कर्मों का भी कारक है। इसके स्वामी की स्थिति, उसके बली होने अथवा दुर्बल रहने पर संतान प्राप्ति का समय, संख्या एवं स्वरूप निर्भर करता है। गुरु, जो कि ज्ञान एवं संतान का कारक ग्रह है, जब कन्या राशि से दृष्ट होता है अथवा 5वें भाव में स्थित होता है, तब संतान योग अत्यंत फलदायी होता है। इसी प्रकार सप्तमेश का संबंध विवाह एवं दाम्पत्य जीवन से है, जो संतान प्राप्ति का माध्यम भी है। कन्या राशि वालों के लिए यह जानना आवश्यक है कि उनकी कुंडली में 5वाँ भाव किस प्रकार स्थित है और उसके स्वामी की दशा कब फलित होगी। आइए, विस्तार से समझते हैं। कन्या राशि की कुंडली में 5वाँ भाव: स्थिति एवं स्वामी का विश्लेषण कन्या राशि वालों की कुंडली में 5वाँ भाव यदि बलवान हो तो संतान प्राप्ति की संभावनाएँ प्रबल होती हैं। 5वाँ भाव कन्या राशि वालों के लिए किस प्रकार फलदायी होता है, इसका निर्धारण निम्न बिंदुओं पर निर्भर करता है: 5वें भाव का स्वामी: यदि 5वें भाव का स्वामी उच्च राशि में अथवा अपने घर में हो, तो संतान प्राप्ति शीघ्र होती है। उदाहरण के लिए, यदि 5वें भाव का स्वामी मेष, सिंह अथवा धनु राशि में हो, जहाँ गुरु बलवान होता है, तो संतान योग अत्यंत प्रभावी होता है। 5वाँ भाव स्वयं बलवान हो: यदि 5वाँ भाव कर्क, वृश्चिक अथवा मीन राशि में हो, जहाँ चंद्र, मंगल अथवा गुरु का प्रभाव रहता है, तो संतान सुख की प्राप्ति स्वाभाविक होती है। 5वें भाव में स्थित ग्रह: यदि 5वें भाव में गुरु, चंद्र अथवा बुध स्थित हों, तो संतान संबंधी योग अत्यंत मजबूत होते हैं। विशेष रूप से गुरु का 5वें भाव में स्थित होना सर्वाधिक फलदायी है। कन्या राशि वालों के लिए यदि 5वाँ भाव मेष, वृषभ अथवा मिथुन राशि में हो, तो संतान योग की संभावना अपेक्षाकृत कम होती है, क्योंकि इन राशियों के स्वामी मंगल, शुक्र एवं बुध की स्थिति संतान कारक ग्रह गुरु से विपरीत हो सकती है। ऐसे में गुरु का दृष्टि अथवा योग प्रभाव आवश्यक होता है। कन्या राशि वालों के लिए 5वें भाव का विश्लेषण करते समय यह भी देखना चाहिए कि क्या 5वाँ भाव किसी शुभ ग्रह द्वारा दृष्ट है अथवा नहीं। यदि 5वाँ भाव गुरु अथवा चंद्र द्वारा दृष्ट है, तो संतान प्राप्ति के मार्ग प्रशस्त होते हैं। संतान कारक ग्रह गुरु: कन्या राशि से गुरु की स्थिति गुरु, जो कि संतान एवं ज्ञान का कारक ग्रह है, कन्या राशि वालों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। गुरु जब कन्या राशि से दृष्ट होता है अथवा कन्या राशि में स्थित होता है, तो संतान योग अत्यंत बलवान होता है। कन्या राशि में गुरु का स्थित होना संतान प्राप्ति के लिए शुभ माना जाता है, क्योंकि कन्या राशि का स्वामी बुध है, जो कि बुद्धि एवं संवाद का कारक है। जब गुरु कन्या राशि से दृष्ट होता है, विशेष रूप से 5वें भाव अथवा 9वें भाव पर, तब संतान प्राप्ति के योग बनते हैं। गुरु का 5वें भाव पर दृष्ट होना अत्यंत फलदायी होता है, क्योंकि यह सीधे संतान कारक भाव को प्रभावित करता है। गुरु का कन्या राशि में स्थित होना अथवा दृष्ट होना निम्न प्रकार से फलित होता है: गुरु कन्या राशि में स्थित हो: यदि गुरु कन्या राशि में स्थित है, तो संतान प्राप्ति के लिए दशा एवं अंतर्दशा का ध्यान रखना चाहिए। गुरु की दशा में संतान प्राप्ति की संभावना प्रबल होती है। गुरु कन्या राशि से 5वें भाव पर दृष्ट हो: यदि गुरु कन्या राशि से 5वें भाव पर दृष्ट करता है, तो संतान योग अत्यंत मजबूत होता है। यह स्थिति संतान प्राप्ति के लिए सर्वाधिक शुभ मानी जाती है। गुरु कन्या राशि से 9वें भाव पर दृष्ट हो: 9वाँ भाव धर्म, गुरु एवं संतान से संबंधित होता है। गुरु का 9वें भाव पर दृष्ट होना भी संतान योग को बल प्रदान करता है। गुरु का कन्या राशि से संबंध संतान प्राप्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि गुरु दुर्बल अथवा पीड़ित हो, तो संतान योग में बाधा उत्पन्न हो सकती है। ऐसे में गुरु के उपाय, जैसे गुरुवार को पीले वस्त्र धारण करना अथवा गुरु मंत्र का जाप करना, लाभकारी होता है। पुत्र अथवा पुत्री प्राप्ति के शास्त्रीय योग ज्योतिष शास्त्र में पुत्र एवं पुत्री प्राप्ति के लिए अलग-अलग योगों का वर्णन मिलता है। पुत्र प्राप्ति के लिए मंगल एवं सूर्य का बलवान होना आवश्यक है, जबकि पुत्री प्राप्ति के लिए चंद्र एवं शुक्र का बलवान होना आवश्यक माना जाता है। कन्या राशि वालों के लिए पुत्र अथवा पुत्री प्राप्ति का विचार निम्न प्रकार से किया जाता है: पुत्र प्राप्ति के योग: यदि 5वाँ भाव अथवा उसके स्वामी पर मंगल अथवा सूर्य का प्रभाव हो, तो पुत्र प्राप्ति के योग बनते हैं। विशेष रूप से मंगल का 5वें भाव पर स्थित होना अथवा दृष्ट होना पुत्र प्राप्ति के लिए शुभ माना जाता है। पुत्री प्राप्ति के योग: यदि 5वाँ भाव अथवा उसके स्वामी पर चंद्र अथवा शुक्र का प्रभाव हो, तो पुत्री प्राप्ति के योग बनते हैं। चंद्र का 5वें भाव पर स्थित होना अथवा दृष्ट होना पुत्री प्राप्ति के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। गुरु एवं चंद्र का संयोग: यदि गुरु एवं चंद्र का संयोग 5वें भाव में हो, तो संतान प्राप्ति के साथ-साथ संतान का स्वास्थ्य एवं बुद्धिमत्ता भी उत्तम होती है। कन्या राशि वालों के लिए पुत्र अथवा पुत्री प्राप्ति का विचार करते समय यह भी देखना चाहिए कि क्या 5वाँ भाव अथवा उसके स्वामी पर शनि अथवा राहु का प्रभाव है। शनि का प्रभाव होने पर संतान प्राप्ति में विलंब हो सकता है, जबकि राहु का प्रभाव होने पर संतान संबंधी चिंताएँ उत्पन्न हो सकती हैं। शास्त्रीय ग्रंथों में पुत्री प्राप्ति के लिए विशेष योग का वर्णन मिलता है। उदाहरण के लिए, यदि 5वाँ भाव कर्क राशि में हो अथवा चंद्र द्वारा दृष्ट हो, तो पुत्री प्राप्ति के योग बनते हैं। (BPHS 30. 29-30) इसके विपरीत, यदि 5वाँ भाव सिंह राशि में हो अथवा सूर्य द्वारा दृष्ट हो, तो पुत्र प्राप्ति के योग बनते हैं। इस प्रकार, कुंडली में 5वें भाव एवं उसके स्वामी के आधार पर संतान का स्वरूप निर्धारित होता है। संतान प्राप्ति का समय: कौन-सी दशा-अंतर्दशा में संभावनाएँ सबसे प्रबल संतान प्राप्ति का समय कुंडली में स्थित दशा एवं अंतर्दशा के आधार पर निर्धारित होता है। दशा वह समयावधि होती है जिसमें ग्रहों की दशा के अनुसार फल प्राप्त होते हैं। कन्या राशि वालों के लिए संतान प्राप्ति का समय निम्न प्रकार से निर्धारित किया जाता है: गुरु दशा: गुरु की दशा में संतान प्राप्ति की सर्वाधिक संभावना होती है। गुरु की दशा 16 वर्ष से 24 वर्ष तक रहती है, जिसमें संतान प्राप्ति के योग बनते हैं। यदि कुंडली में गुरु बलवान हो, तो गुरु दशा में संतान प्राप्ति निश्चित होती है। बुध दशा: कन्या राशि वालों के लिए बुध की दशा भी संतान प्राप्ति में सहायक होती है, क्योंकि बुध कन्या राशि का स्वामी है। बुध की दशा 17 वर्ष से 27 वर्ष तक रहती है, जिसमें संतान प्राप्ति के योग बन सकते हैं। शुक्र दशा: शुक्र की दशा में संतान प्राप्ति की संभावना कम होती है, परंतु यदि शुक्र 5वें भाव अथवा उसके स्वामी पर दृष्ट हो, तो संतान प्राप्ति के योग बन सकते हैं। अंतर्दशा का प्रभाव: दशा के भीतर आने वाली अंतर्दशा भी संतान प्राप्ति के समय को निर्धारित करती है। उदाहरण के लिए, गुरु दशा में यदि चंद्र अथवा गुरु की अंतर्दशा हो, तो संतान प्राप्ति की संभावना अत्यंत प्रबल होती है। कन्या राशि वालों के लिए संतान प्राप्ति का समय निर्धारित करते समय यह भी देखना चाहिए कि क्या दशा के दौरान 5वाँ भाव अथवा उसके स्वामी पर किसी शुभ ग्रह का प्रभाव है। यदि दशा के दौरान 5वें भाव पर गुरु अथवा चंद्र का प्रभाव हो, तो संतान प्राप्ति निश्चित होती है। इसके विपरीत, यदि दशा के दौरान 5वें भाव पर शनि अथवा राहु का प्रभाव हो, तो संतान प्राप्ति में विलंब अथवा बाधा उत्पन्न हो सकती है। ऐसे में गुरु अथवा चंद्र के उपाय करने से शुभ फल प्राप्त होते हैं। संतान सुख में बाधा के योग और शास्त्रीय परिहार कन्या राशि वालों के लिए संतान सुख में अनेक प्रकार की बाधाएँ उत्पन्न हो सकती हैं। इन बाधाओं का कारण कुंडली में स्थित अशुभ ग्रह, अशुभ योग अथवा अशुभ दशा हो सकती है। संतान सुख में बाधा उत्पन्न करने वाले प्रमुख योग निम्न प्रकार हैं: राहु-केतु का प्रभाव: यदि कुंडली में 5वाँ भाव अथवा उसके स्वामी पर राहु अथवा केतु का प्रभाव हो, तो संतान संबंधी चिंताएँ उत्पन्न हो सकती हैं। राहु का प्रभाव होने पर संतान प्राप्ति में विलंब अथवा स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। ऐसे में राहु शांति के उपाय, जैसे राहु मंत्र का जाप अथवा राहु शांति पूजा करना, लाभकारी होता है। शनि का पीड़ित होना: शनि का 5वें भाव अथवा उसके स्वामी पर पीड़ित होना संतान प्राप्ति में विलंब का कारण बन सकता है। शनि का प्रभाव होने पर संतान संबंधी चिंताएँ उत्पन्न होती हैं। ऐसे में शनि शांति के उपाय, जैसे शनि मंत्र का जाप अथवा शनि शांति पूजा करना, लाभकारी होता है। मांगलिक दोष: यदि कुंडली में मांगलिक दोष हो, तो विवाह के पश्चात् संतान प्राप्ति में विलंब हो सकता है। मांगलिक दोष के निवारण के लिए कुंडली मिलान करते समय विशेष ध्यान रखा जाता है। नाड़ी दोष: यदि कुंडली में नाड़ी दोष हो, तो संतान प्राप्ति में बाधा उत्पन्न हो सकती है। नाड़ी दोष के निवारण के लिए कुंडली मिलान करते समय विशेष ध्यान रखा जाता है। संतान सुख में बाधा उत्पन्न करने वाले योगों का निवारण करने के लिए शास्त्रीय उपाय अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इन योगों का निवारण करने के लिए ग्रह शांति, पूजा-अर्चना एवं मंत्र जाप किए जाते हैं। इसके साथ ही, कुंडली मिलान करते समय भी इन योगों का विशेष ध्यान रखा जाता है। शास्त्रीय ग्रंथों में संतान सुख में बाधा उत्पन्न करने वाले योगों का वर्णन मिलता है। उदाहरण के लिए, यदि 5वाँ भाव शनि अथवा राहु द्वारा दृष्ट हो, तो संतान प्राप्ति में विलंब हो सकता है। (BPHS 54. 12) ऐसे में गुरु अथवा चंद्र के उपाय करने से शुभ फल प्राप्त होते हैं। गुरु अथवा चंद्र के उपाय के रूप में गुरुवार को पीले वस्त्र धारण करना, गुरु मंत्र का जाप करना अथवा चंद्र देव की पूजा करना लाभकारी होता है। नाड़ी दोष का संतान पर प्रभाव नाड़ी दोष, जो कि कुंडली मिलान के समय देखा जाता है, संतान प्राप्ति पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है। नाड़ी दोष का संबंध आयुर्वेद एवं ज्योतिष दोनों से है। यदि कुंडली मिलान करते समय नाड़ी दोष पाया जाता है, तो विवाह के पश्चात् संतान प्राप्ति में विलंब हो सकता है। नाड़ी दोष के मुख्य प्रकार निम्न हैं: आदि नाड़ी: आदि नाड़ी वाले जातकों के लिए संतान प्राप्ति में विलंब हो सकता है। आदि नाड़ी वाले जातकों को विवाह के पश्चात् विशेष प्रयास करने पड़ते हैं। मध्य नाड़ी: मध्य नाड़ी वाले जातकों के लिए संतान प्राप्ति में सामान्य विलंब हो सकता है। मध्य नाड़ी वाले जातकों को संतान प्राप्ति के लिए विशेष प्रयास करने पड़ते हैं। अंत नाड़ी: अंत नाड़ी वाले जातकों के लिए संतान प्राप्ति में अत्यंत विलंब हो सकता है। अंत नाड़ी वाले जातकों को संतान प्राप्ति के लिए विशेष ध्यान रखना पड़ता है। नाड़ी दोष के निवारण के लिए कुंडली मिलान करते समय विशेष ध्यान रखा जाता है। यदि कुंडली मिलान करते समय नाड़ी दोष पाया जाता है, तो विशेष उपाय किए जाते हैं, जैसे नाड़ी दोष निवारण पूजा अथवा मंत्र जाप। शास्त्रीय ग्रंथों में नाड़ी दोष का वर्णन मिलता है। उदाहरण के लिए, यदि कुंडली मिलान करते समय नाड़ी दोष पाया जाता है, तो विवाह के पश्चात् संतान प्राप्ति में विलंब हो सकता है। (BPHS 70.

कन्या राशि वालों के लिए संतान योग: एक शास्त्रीय एवं संवेदनशील विश्लेषण

ज्योतिष शास्त्र में संतान योग का अत्यंत महत्व है। यह केवल सांसारिक सुख का विषय नहीं, अपितु आत्मिक उत्तरदायित्व का भी प्रतीक है। जब कुंडली में 5वाँ भाव और उसके स्वामी के साथ-साथ गुरु एवं सप्तमेश की स्थिति बलवान होती है, तभी संतान योग फलित होता है। कन्या राशि वालों के लिए यह विश्लेषण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस राशि के स्वभाव, बुद्धि एवं व्यवहारिक दृष्टिकोण का सीधा संबंध संतान सुख से जुड़ता है।

संतान योग के निर्माण में 5वाँ भाव सर्वाधिक निर्णायक होता है। यह भाव मनोरंजन, बुद्धि, धर्म, संतान एवं पूर्व जन्म के कर्मों का भी कारक है। इसके स्वामी की स्थिति, उसके बली होने अथवा दुर्बल रहने पर संतान प्राप्ति का समय, संख्या एवं स्वरूप निर्भर करता है। गुरु, जो कि ज्ञान एवं संतान का कारक ग्रह है, जब कन्या राशि से दृष्ट होता है अथवा 5वें भाव में स्थित होता है, तब संतान योग अत्यंत फलदायी होता है। इसी प्रकार सप्तमेश का संबंध विवाह एवं दाम्पत्य जीवन से है, जो संतान प्राप्ति का माध्यम भी है।

कन्या राशि वालों के लिए यह जानना आवश्यक है कि उनकी कुंडली में 5वाँ भाव किस प्रकार स्थित है और उसके स्वामी की दशा कब फलित होगी। आइए, विस्तार से समझते हैं।

कन्या राशि की कुंडली में 5वाँ भाव: स्थिति एवं स्वामी का विश्लेषण

कन्या राशि वालों की कुंडली में 5वाँ भाव यदि बलवान हो तो संतान प्राप्ति की संभावनाएँ प्रबल होती हैं। 5वाँ भाव कन्या राशि वालों के लिए किस प्रकार फलदायी होता है, इसका निर्धारण निम्न बिंदुओं पर निर्भर करता है:

कन्या राशि वालों के लिए यदि 5वाँ भाव मेष, वृषभ अथवा मिथुन राशि में हो, तो संतान योग की संभावना अपेक्षाकृत कम होती है, क्योंकि इन राशियों के स्वामी मंगल, शुक्र एवं बुध की स्थिति संतान कारक ग्रह गुरु से विपरीत हो सकती है। ऐसे में गुरु का दृष्टि अथवा योग प्रभाव आवश्यक होता है।

कन्या राशि वालों के लिए 5वें भाव का विश्लेषण करते समय यह भी देखना चाहिए कि क्या 5वाँ भाव किसी शुभ ग्रह द्वारा दृष्ट है अथवा नहीं। यदि 5वाँ भाव गुरु अथवा चंद्र द्वारा दृष्ट है, तो संतान प्राप्ति के मार्ग प्रशस्त होते हैं।

संतान कारक ग्रह गुरु: कन्या राशि से गुरु की स्थिति

गुरु, जो कि संतान एवं ज्ञान का कारक ग्रह है, कन्या राशि वालों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। गुरु जब कन्या राशि से दृष्ट होता है अथवा कन्या राशि में स्थित होता है, तो संतान योग अत्यंत बलवान होता है। कन्या राशि में गुरु का स्थित होना संतान प्राप्ति के लिए शुभ माना जाता है, क्योंकि कन्या राशि का स्वामी बुध है, जो कि बुद्धि एवं संवाद का कारक है।

जब गुरु कन्या राशि से दृष्ट होता है, विशेष रूप से 5वें भाव अथवा 9वें भाव पर, तब संतान प्राप्ति के योग बनते हैं। गुरु का 5वें भाव पर दृष्ट होना अत्यंत फलदायी होता है, क्योंकि यह सीधे संतान कारक भाव को प्रभावित करता है।

गुरु का कन्या राशि में स्थित होना अथवा दृष्ट होना निम्न प्रकार से फलित होता है:

गुरु का कन्या राशि से संबंध संतान प्राप्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि गुरु दुर्बल अथवा पीड़ित हो, तो संतान योग में बाधा उत्पन्न हो सकती है। ऐसे में गुरु के उपाय, जैसे गुरुवार को पीले वस्त्र धारण करना अथवा गुरु मंत्र का जाप करना, लाभकारी होता है।

पुत्र अथवा पुत्री प्राप्ति के शास्त्रीय योग

ज्योतिष शास्त्र में पुत्र एवं पुत्री प्राप्ति के लिए अलग-अलग योगों का वर्णन मिलता है। पुत्र प्राप्ति के लिए मंगल एवं सूर्य का बलवान होना आवश्यक है, जबकि पुत्री प्राप्ति के लिए चंद्र एवं शुक्र का बलवान होना आवश्यक माना जाता है। कन्या राशि वालों के लिए पुत्र अथवा पुत्री प्राप्ति का विचार निम्न प्रकार से किया जाता है:

कन्या राशि वालों के लिए पुत्र अथवा पुत्री प्राप्ति का विचार करते समय यह भी देखना चाहिए कि क्या 5वाँ भाव अथवा उसके स्वामी पर शनि अथवा राहु का प्रभाव है। शनि का प्रभाव होने पर संतान प्राप्ति में विलंब हो सकता है, जबकि राहु का प्रभाव होने पर संतान संबंधी चिंताएँ उत्पन्न हो सकती हैं।

शास्त्रीय ग्रंथों में पुत्री प्राप्ति के लिए विशेष योग का वर्णन मिलता है। उदाहरण के लिए, यदि 5वाँ भाव कर्क राशि में हो अथवा चंद्र द्वारा दृष्ट हो, तो पुत्री प्राप्ति के योग बनते हैं। (BPHS 30.29-30)

इसके विपरीत, यदि 5वाँ भाव सिंह राशि में हो अथवा सूर्य द्वारा दृष्ट हो, तो पुत्र प्राप्ति के योग बनते हैं। इस प्रकार, कुंडली में 5वें भाव एवं उसके स्वामी के आधार पर संतान का स्वरूप निर्धारित होता है।

संतान प्राप्ति का समय: कौन-सी दशा-अंतर्दशा में संभावनाएँ सबसे प्रबल

संतान प्राप्ति का समय कुंडली में स्थित दशा एवं अंतर्दशा के आधार पर निर्धारित होता है। दशा वह समयावधि होती है जिसमें ग्रहों की दशा के अनुसार फल प्राप्त होते हैं। कन्या राशि वालों के लिए संतान प्राप्ति का समय निम्न प्रकार से निर्धारित किया जाता है:

कन्या राशि वालों के लिए संतान प्राप्ति का समय निर्धारित करते समय यह भी देखना चाहिए कि क्या दशा के दौरान 5वाँ भाव अथवा उसके स्वामी पर किसी शुभ ग्रह का प्रभाव है। यदि दशा के दौरान 5वें भाव पर गुरु अथवा चंद्र का प्रभाव हो, तो संतान प्राप्ति निश्चित होती है।

इसके विपरीत, यदि दशा के दौरान 5वें भाव पर शनि अथवा राहु का प्रभाव हो, तो संतान प्राप्ति में विलंब अथवा बाधा उत्पन्न हो सकती है। ऐसे में गुरु अथवा चंद्र के उपाय करने से शुभ फल प्राप्त होते हैं।

संतान सुख में बाधा के योग और शास्त्रीय परिहार

कन्या राशि वालों के लिए संतान सुख में अनेक प्रकार की बाधाएँ उत्पन्न हो सकती हैं। इन बाधाओं का कारण कुंडली में स्थित अशुभ ग्रह, अशुभ योग अथवा अशुभ दशा हो सकती है। संतान सुख में बाधा उत्पन्न करने वाले प्रमुख योग निम्न प्रकार हैं:

संतान सुख में बाधा उत्पन्न करने वाले योगों का निवारण करने के लिए शास्त्रीय उपाय अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इन योगों का निवारण करने के लिए ग्रह शांति, पूजा-अर्चना एवं मंत्र जाप किए जाते हैं। इसके साथ ही, कुंडली मिलान करते समय भी इन योगों का विशेष ध्यान रखा जाता है।

शास्त्रीय ग्रंथों में संतान सुख में बाधा उत्पन्न करने वाले योगों का वर्णन मिलता है। उदाहरण के लिए, यदि 5वाँ भाव शनि अथवा राहु द्वारा दृष्ट हो, तो संतान प्राप्ति में विलंब हो सकता है। (BPHS 54.12)

ऐसे में गुरु अथवा चंद्र के उपाय करने से शुभ फल प्राप्त होते हैं। गुरु अथवा चंद्र के उपाय के रूप में गुरुवार को पीले वस्त्र धारण करना, गुरु मंत्र का जाप करना अथवा चंद्र देव की पूजा करना लाभकारी होता है।

नाड़ी दोष का संतान पर प्रभाव

नाड़ी दोष, जो कि कुंडली मिलान के समय देखा जाता है, संतान प्राप्ति पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है। नाड़ी दोष का संबंध आयुर्वेद एवं ज्योतिष दोनों से है। यदि कुंडली मिलान करते समय नाड़ी दोष पाया जाता है, तो विवाह के पश्चात् संतान प्राप्ति में विलंब हो सकता है।

नाड़ी दोष के मुख्य प्रकार निम्न हैं:

नाड़ी दोष के निवारण के लिए कुंडली मिलान करते समय विशेष ध्यान रखा जाता है। यदि कुंडली मिलान करते समय नाड़ी दोष पाया जाता है, तो विशेष उपाय किए जाते हैं, जैसे नाड़ी दोष निवारण पूजा अथवा मंत्र जाप।

शास्त्रीय ग्रंथों में नाड़ी दोष का वर्णन मिलता है। उदाहरण के लिए, यदि कुंडली मिलान करते समय नाड़ी दोष पाया जाता है, तो विवाह के पश्चात् संतान प्राप्ति में विलंब हो सकता है। (BPHS 70.27)

नाड़ी दोष का निवारण करने के लिए विशेष पूजा एवं मंत्र जाप किए जाते हैं। इसके साथ ही, विवाह के पश्चात् संतान प्राप्ति के लिए विशेष प्रयास किए जाते हैं।

ऊपर का लेख सामान्य स्थिति का है। आपकी कुंडली विशिष्ट है — कैरियर का समय, रिश्ते, स्वास्थ्य, जो भी पूछना चाहें।

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मानवीय परिप्रेक्ष्य: ज्योतिषीय योग मार्गदर्शन हैं, चिकित्सकीय परामर्श नहीं

ज्योतिष शास्त्र संतान योग का वर्णन करता है, परंतु यह चिकित्सकीय पर

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