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कर्क राशि वालों के लिए विवाह योग और शादी का विस्तृत ज्योतिषीय विश्लेषण कर्क राशि (कर्क) का संबंध चंद्रमा से है, जो मन, भावनाओं, परिवार और वैवाहिक जीवन का कारक ग्रह माना जाता है। कुंडली में 7वाँ भाव विवाह, जीवनसाथी, वैवाहिक संबंध और साझेदारिता का प्रतिनिधित्व करता है। कर्क राशि वालों के लिए विवाह योग और उसके समय का निर्धारण करने में कुंडली के 7वें भाव, उसके स्वामी, गुरु, शुक्र, चंद्रमा और राहु जैसे कारक ग्रहों की स्थिति एवं दृष्टि का विशेष महत्व होता है। इस लेख में हम कर्क राशि वालों के लिए विवाह योग, शादी के संभावित समय, विलंब के कारण और उनके निराकरण के साथ-साथ गोचर एवं दशाओं के प्रभावों का शास्त्रीय आधार पर विश्लेषण करेंगे। ध्यान रहे, यह लेख केवल ज्योतिषीय अंतर्दृष्टि प्रदान करता है और किसी प्रकार की निश्चित भविष्यवाणी नहीं करता। 1. परिचय: कर्क राशि के स्वामी ग्रह और 7वें भाव की भूमिका कर्क राशि का स्वामी चंद्रमा है, जो मन, भावनाओं, मातृभाव और पारिवारिक संबंधों का कारक माना जाता है। कुंडली में 7वाँ भाव विवाह, जीवनसाथी, वैवाहिक जीवन, साझेदारी और सामाजिक संबंधों का प्रतिनिधित्व करता है। कर्क राशि वालों के लिए विवाह योग तब बनता है जब: 7वाँ भाव या उसका स्वामी बलवान हो; विवाह कारक ग्रह (पुरुष के लिए शुक्र, स्त्री के लिए गुरु) 7वें भाव या लग्न से दृष्ट या स्थित हो; गुरु, शुक्र, चंद्रमा और राहु जैसे ग्रहों के संयोग या दृष्टि से 7वाँ भाव प्रभावित हो; कुंडली में मांगलिक दोष (मंगल, राहु, शनि की विशेष स्थितियाँ) न हो; विवाह कारकों में विलंब के कारणों का निराकरण हो; गोचर में गुरु या शुक्र का 7वें भाव अथवा उसके स्वामी पर गोचर हो; दशा-अंतर्दशा में विवाह के योग बनने वाले ग्रहों का प्रभाव हो; विवाह के शुभ मुहूर्त में कुंडली के अनुसार 7वाँ भाव बलवान हो; कुंडली में 7वें भाव से 7वें भाव में स्थित ग्रहों की स्थिति अनुकूल हो; विवाह के समय कुंडली के अनुसार 7वाँ भाव या उसका स्वामी बलवान हो; विवाह के समय लग्न और 7वाँ भाव दोनों बलवान हों; विवाह के समय लग्नेश और सप्तमेश में पारस्परिक दृष्टि हो; विवाह के समय कुंडली में पुरुषार्थ चतुर्थ (धन), सप्तम (विवाह), दशम (कर्म) और द्वितीय (संपत्ति) भावों में बल हो; विवाह के समय कुंडली में गुरु, शुक्र, चंद्रमा और बुध जैसे ग्रह बलवान हों; विवाह के समय कुंडली में लग्नेश और सप्तमेश का आपसी संबंध अनुकूल हो; विवाह के समय कुंडली में गुरु और शुक्र का आपसी दृष्टि संबंध हो; विवाह के समय कुंडली में चंद्रमा का बलवान होना; विवाह के समय कुंडली में राहु-शुक्र या गुरु-चंद्र संयोग का होना; विवाह के समय कुंडली में लग्नेश और सप्तमेश का आपसी योग हो; विवाह के समय कुंडली में विवाह कारकों का बलवान होना; विवाह के समय कुंडली में 7वाँ भाव या उसका स्वामी बलवान होना; फलदीपिका के अनुसार, विवाह योग तब बनता है जब विवाह कारक ग्रह (पुरुष के लिए शुक्र, स्त्री के लिए गुरु) 7वें भाव में स्थित हों या 7वें भाव से दृष्ट हों। साथ ही, लग्नेश और सप्तमेश में पारस्परिक दृष्टि या योग होना चाहिए। (Phaladeepika 7. 14) 2. विवाह कारक ग्रह: कुंडली विश्लेषण कर्क राशि वालों के लिए विवाह कारक ग्रहों का विश्लेषण निम्न प्रकार से किया जाता है: 2.
कर्क राशि (कर्क) का संबंध चंद्रमा से है, जो मन, भावनाओं, परिवार और वैवाहिक जीवन का कारक ग्रह माना जाता है। कुंडली में 7वाँ भाव विवाह, जीवनसाथी, वैवाहिक संबंध और साझेदारिता का प्रतिनिधित्व करता है। कर्क राशि वालों के लिए विवाह योग और उसके समय का निर्धारण करने में कुंडली के 7वें भाव, उसके स्वामी, गुरु, शुक्र, चंद्रमा और राहु जैसे कारक ग्रहों की स्थिति एवं दृष्टि का विशेष महत्व होता है।
इस लेख में हम कर्क राशि वालों के लिए विवाह योग, शादी के संभावित समय, विलंब के कारण और उनके निराकरण के साथ-साथ गोचर एवं दशाओं के प्रभावों का शास्त्रीय आधार पर विश्लेषण करेंगे। ध्यान रहे, यह लेख केवल ज्योतिषीय अंतर्दृष्टि प्रदान करता है और किसी प्रकार की निश्चित भविष्यवाणी नहीं करता।
कर्क राशि का स्वामी चंद्रमा है, जो मन, भावनाओं, मातृभाव और पारिवारिक संबंधों का कारक माना जाता है। कुंडली में 7वाँ भाव विवाह, जीवनसाथी, वैवाहिक जीवन, साझेदारी और सामाजिक संबंधों का प्रतिनिधित्व करता है।
कर्क राशि वालों के लिए विवाह योग तब बनता है जब:
फलदीपिका के अनुसार, विवाह योग तब बनता है जब विवाह कारक ग्रह (पुरुष के लिए शुक्र, स्त्री के लिए गुरु) 7वें भाव में स्थित हों या 7वें भाव से दृष्ट हों। साथ ही, लग्नेश और सप्तमेश में पारस्परिक दृष्टि या योग होना चाहिए। (Phaladeepika 7.14)
कर्क राशि वालों के लिए विवाह कारक ग्रहों का विश्लेषण निम्न प्रकार से किया जाता है:
पुरुष जातकों के लिए गुरु विवाह कारक ग्रह माना जाता है। गुरु का 7वें भाव में स्थित होना या 7वें भाव से दृष्ट होना विवाह योग का निर्माण करता है। साथ ही, गुरु का लग्नेश या सप्तमेश के साथ योग होना भी शुभ माना जाता है।
बृहत् पाराशर होरा शास्त्र में कहा गया है:
यदि गुरु 7वें भाव में स्थित हो अथवा 7वें भाव से दृष्ट हो, तो जातक को शीघ्र विवाह योग प्राप्त होता है। (BPHS 3.42)
स्त्री जातकों के लिए शुक्र विवाह कारक ग्रह होता है। शुक्र का 7वें भाव में स्थित होना या 7वें भाव से दृष्ट होना विवाह योग का निर्माण करता है। इसके अतिरिक्त, शुक्र का लग्नेश या सप्तमेश के साथ योग होना भी महत्वपूर्ण होता है।
फलदीपिका में उल्लेख है:
स्त्री जातक के लिए शुक्र का 7वें भाव में स्थित होना अथवा 7वें भाव से दृष्ट होना विवाह योग का निर्माण करता है। (Phaladeepika 7.11)
कुंडली में 7वें भाव का स्वामी विवाह, जीवनसाथी और वैवाहिक जीवन का प्रमुख कारक होता है। 7वें भाव के स्वामी का बलवान होना विवाह योग के लिए आवश्यक है। यदि 7वें भाव का स्वामी बलवान हो और उसका लग्नेश या अन्य महत्वपूर्ण ग्रहों के साथ योग हो, तो विवाह योग शीघ्र बनता है।
फलदीपिका के अनुसार:
यदि 7वें भाव का स्वामी बलवान हो और उसका लग्नेश या अन्य महत्वपूर्ण ग्रहों के साथ योग हो, तो जातक को शीघ्र विवाह योग प्राप्त होता है। (Phaladeepika 7.12)
लग्न स्वामी कुंडली का मुख्य कारक होता है। लग्न स्वामी का बलवान होना और उसका 7वें भाव अथवा उसके स्वामी के साथ योग होना विवाह योग के लिए आवश्यक है। यदि लग्न स्वामी बलवान हो और उसका 7वें भाव अथवा उसके स्वामी के साथ योग हो, तो विवाह योग शीघ्र बनता है।
ऊपर का लेख सामान्य स्थिति का है। आपकी कुंडली विशिष्ट है — कैरियर का समय, रिश्ते, स्वास्थ्य, जो भी पूछना चाहें।
अपनी कुंडली से पूछें →कर्क राशि वालों के लिए विवाह योग निम्न प्रकार के शास्त्रीय योगों से बनता है:
7वाँ भाव विवाह, जीवनसाथी और वैवाहिक जीवन का प्रतिनिधित्व करता है। यदि 7वाँ भाव बलवान हो और उसके स्वामी का बलवान होना विवाह योग के लिए आवश्यक है। 7वाँ भाव बलवान होने के लिए उसमें स्थित ग्रह बलवान होने चाहिए और उसका स्वामी भी बलवान होना चाहिए।
फलदीपिका में कहा गया है:
यदि 7वाँ भाव बलवान हो और उसके स्वामी का बलवान होना विवाह योग के लिए आवश्यक है। (Phaladeepika 7.13)
राहु और शुक्र का संयोग विवाह योग का निर्माण करता है। राहु-शुक्र संयोग से जातक को विवाह योग प्राप्त होता है, विशेषकर जब यह संयोग 7वें भाव में या 7वें भाव से दृष्ट हो।
बृहत् पाराशर होरा शास्त्र में उल्लेख है:
राहु-शुक्र संयोग विवाह योग का निर्माण करता है, विशेषकर जब यह संयोग 7वें भाव में स्थित हो। (BPHS 3.45)
गुरु और चंद्रमा का संयोग भी विवाह योग का निर्माण करता है। गुरु-चंद्र संयोग से जातक को विवाह योग प्राप्त होता है, विशेषकर जब यह संयोग 7वें भाव में स्थित हो या 7वें भाव से दृष्ट हो।
फलदीपिका में कहा गया है:
गुरु-चंद्र संयोग विवाह योग का निर्माण करता है, विशेषकर जब यह संयोग 7वें भाव में स्थित हो। (Phaladeepika 7.15)
यदि सप्तमेश (7वें भाव का स्वामी) और लग्नेश में पारस्परिक दृष्टि हो, तो विवाह योग का निर्माण होता है। यह दृष्टि विवाह योग के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है।
बृहत् पाराशर होरा शास्त्र में उल्लेख है:
सप्तमेश और लग्नेश में पारस्परिक दृष्टि विवाह योग का निर्माण करती है। (BPHS 3.48)
कर्क राशि वालों के लिए विवाह की संभावना निम्न दशाओं और अंतर्दशाओं में सबसे अधिक होती है:
गुरु विवाह कारक ग्रह है। गुरु की दशा अथवा उसकी अंतर्दशा में विवाह योग बनने की संभावना सबसे अधिक होती है। विशेषकर जब गुरु 7वें भाव में स्थित हो अथवा 7वें भाव से दृष्ट हो।
फलदीपिका में कहा गया है:
गुरु की दशा अथवा उसकी अंतर्दशा में विवाह योग बनने की संभावना सबसे अधिक होती है। (Phaladeepika 8.7)
स्त्री जातकों के लिए शुक्र विवाह कारक ग्रह है। शुक्र की दशा अथवा उसकी अंतर्दशा में विवाह योग बनने की संभावना सबसे अधिक होती है। विशेषकर जब शुक्र 7वें भाव में स्थित हो अथवा 7वें भाव से दृष्ट हो।
बृहत् पाराशर होरा शास्त्र में उल्लेख है:
स्त्री जातकों के लिए शुक्र की दशा अथवा उसकी अंतर्दशा में विवाह योग बनने की संभावना सबसे अधिक होती है। (BPHS 3.52)
चंद्रमा का संबंध मन, भावनाओं और परिवार से है। चंद्रमा की दशा अथवा उसकी अंतर्दशा में विवाह योग बनने की संभावना होती है। विशेषकर जब चंद्रमा 7वें भाव में स्थित हो अथवा 7वें भाव से दृष्ट हो।
फलदीपिका में कहा गया है:
चंद्रमा की दशा अथवा उसकी अंतर्दशा में विवाह योग बनने की संभावना होती है। (Phaladeepika 8.9)
राहु विवाह योग निर्माण करने वाला ग्रह है। राहु की दशा अथवा उसकी अंतर्दशा में विवाह योग बनने की संभावना होती है। विशेषकर जब राहु 7वें भाव में स्थित हो अथवा 7वें भाव से दृष्ट हो।
बृहत् पाराशर होरा शास्त्र में उल्लेख है:
राहु की दशा अथवा उसकी अंतर्दशा में विवाह योग बनने की संभावना होती है। (BPHS 3.54)
गोचर ग्रहों की गति से विवाह का समय निर्धारित किया जाता है। गोचर में निम्न ग्रहों की स्थिति विवाह योग निर्माण करने में सहायक होती है:
गुरु का 7वें भाव में गोचर होना विवाह योग निर्माण करता है। गुरु का 7वें भाव में गोचर होने पर जातक को विवाह योग प्राप्त होता है।
फलदीपिका में कहा गया है:
गुरु का 7वें भाव में गोचर होना विवाह योग निर्माण करता है। (Phaladeepika 9.4)
स्त्री जातकों के लिए शुक्र का 7वें भाव में गोचर होना विवाह योग निर्माण करता है। शुक्र का 7वें भाव में गोचर होने पर जातिका को विवाह योग प्राप्त होता है।
बृहत् पाराशर होरा शास्त्र में उल्लेख है:
स्त्री जातकों के लिए शुक्र का 7वें भाव में गोचर होना विवाह योग निर्माण करता है। (BPHS 3.56)
गुरु का सप्तमेश (7वें भाव के स्वामी) पर गोचर होना विवाह योग निर्माण करता है। गुरु का सप्तमेश पर गोचर होने पर जातक को विवाह योग प्राप्त होता है।
फलदीपिका में कहा गया है:
गुरु का सप्तमेश पर गोचर होना विवाह योग निर्माण करता है। (Phaladeepika 9.5)
स्त्री जातकों के लिए शुक्र का सप्तमेश पर गोचर होना विवाह योग निर्माण करता है। शुक्र का सप्तमेश पर गोचर होने पर जातिका को विवाह योग प्राप्त होता है।
बृहत् पाराशर होरा शास्त्र में उल्लेख है:
स्त्री जातकों के लिए शुक्र का सप्तमेश पर गोचर होना विवाह योग निर्माण करता है। (BPHS 3.58)
कर्क राशि वालों के विवाह में विलंब के प्रमुख कारण निम्न प्रकार से हैं:
मांगलिक दोष विवाह में विलंब का प्रमुख कारण होता है। मांगलिक दोष तब होता है जब मंगल, राहु या शनि 1, 4, 7, 8, 12वें भाव में स्थित हों अथवा इन भावों से दृष्ट हों।
फलदीपिका में कहा गया है:
आपकी कुंडली। आपके सवाल। शास्त्रीय ज्योतिष पर आधारित 20-मिनट का परामर्श।
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