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कुंभ राशि वालों के लिए संतान योग: शास्त्रीय विश्लेषण एवं मार्गदर्शन संतान योग कुंडली का एक अत्यंत महत्वपूर्ण योग है, जो जातक की संतान-सुख की प्राप्ति, उसकी संख्या, गुणवत्ता तथा समयावधि का संकेत देता है। ज्योतिष शास्त्र में संतान योग का निर्माण पांचवें भाव के स्वामी, गुरु तथा सप्तमेश के परस्पर संबंध एवं उनकी दशाओं द्वारा होता है। पंचम भाव जातक की संतान, बुद्धि, रचनात्मकता, विद्या तथा पूर्व जन्म के कर्मों का प्रतिनिधित्व करता है (BPHS 3. 42)। इसी प्रकार, गुरु ज्ञान, बुद्धि, धर्म, संतान एवं सुख का कारक ग्रह माना गया है। अतः कुंभ राशि वालों के लिए संतान योग का विश्लेषण करते समय इन तीनों घटकों का सावधानीपूर्वक अध्ययन आवश्यक है। कुंभ राशि में 5वाँ भाव एवं उसके स्वामी का विश्लेशण कुंभ राशि (अग्नि तत्व की राशि) का स्वामी शनि तथा मंगल हैं। कुंभ राशि वालों की कुंडली में 5वाँ भाव कन्या, तुला, मकर अथवा मीन राशि में स्थित हो सकता है, क्योंकि कुंभ राशि के जातकों में जन्म कुंडली के अनुसार पांचवें भाव की स्थिति भिन्न-भिन्न होती है। 5वाँ भाव के स्वामी का प्रभाव यदि कुंभ राशि वाले जातक की कुंडली में 5वाँ भाव कन्या राशि में हो, तो इसके स्वामी बुध होंगे। बुध बुद्धि, विद्या तथा संतान की गुणवत्ता का कारक होता है। यदि बुध उच्च अथवा मित्र राशि में स्थित हो, तो संतान बुद्धिमान एवं गुणवान होगी। इसके विपरीत, यदि बुध नीच अथवा शत्रु राशि में स्थित हो, तो संतान संबंधी कष्ट अथवा विलंब की संभावना रहती है (BPHS 4. 12)। 5वाँ भाव में स्थित ग्रहों का प्रभाव 5वें भाव में स्थित ग्रहों के आधार पर संतान संबंधी अनेक संकेत मिलते हैं। उदाहरणार्थ, यदि 5वें भाव में बृहस्पति स्थित हो, तो जातक को संतान सुख की प्राप्ति शीघ्र होती है। यदि 5वें भाव में शनि स्थित हो, तो संतान प्राप्ति में विलंब अथवा कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है (Phaladeepika 7. 14)। संतान कारक ग्रह गुरु: कुंभ राशि से गुरु की स्थिति गुरु (बृहस्पति) संतान, बुद्धि, धर्म तथा सुख का प्रमुख कारक ग्रह है। कुंभ राशि वालों के लिए गुरु की स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यदि गुरु कुंभ राशि में स्थित हो, तो जातक को संतान सुख की प्राप्ति शीघ्र होती है। गुरु की स्थिति कुंडली के किस भाव में है, इसके आधार पर संतान संबंधी अनेक संकेत मिलते हैं। गुरु की स्थिति एवं संतान योग यदि गुरु 5वें भाव में स्थित हो, तो जातक को संतान सुख शीघ्र मिलता है। यदि गुरु 7वें भाव (विवाह भाव) में स्थित हो, तो विवाह के पश्चात् संतान प्राप्ति होती है। यदि गुरु 10वें भाव (कर्म भाव) में स्थित हो, तो जातक को संतान के कारण समाज में प्रतिष्ठा मिलती है। यदि गुरु 12वें भाव में स्थित हो, तो जातक को विदेश में रहने अथवा विदेश से संतान प्राप्ति की संभावना रहती है। गुरु के उच्च अथवा मित्र राशि में स्थित होने पर संतान संबंधी योग अत्यंत शुभ होते हैं। इसके विपरीत, यदि गुरु नीच अथवा शत्रु राशि में स्थित हो, तो संतान संबंधी कष्ट अथवा विलंब की संभावना रहती है (BPHS 5.
संतान योग कुंडली का एक अत्यंत महत्वपूर्ण योग है, जो जातक की संतान-सुख की प्राप्ति, उसकी संख्या, गुणवत्ता तथा समयावधि का संकेत देता है। ज्योतिष शास्त्र में संतान योग का निर्माण पांचवें भाव के स्वामी, गुरु तथा सप्तमेश के परस्पर संबंध एवं उनकी दशाओं द्वारा होता है। पंचम भाव जातक की संतान, बुद्धि, रचनात्मकता, विद्या तथा पूर्व जन्म के कर्मों का प्रतिनिधित्व करता है (BPHS 3.42)। इसी प्रकार, गुरु ज्ञान, बुद्धि, धर्म, संतान एवं सुख का कारक ग्रह माना गया है। अतः कुंभ राशि वालों के लिए संतान योग का विश्लेषण करते समय इन तीनों घटकों का सावधानीपूर्वक अध्ययन आवश्यक है।
कुंभ राशि (अग्नि तत्व की राशि) का स्वामी शनि तथा मंगल हैं। कुंभ राशि वालों की कुंडली में 5वाँ भाव कन्या, तुला, मकर अथवा मीन राशि में स्थित हो सकता है, क्योंकि कुंभ राशि के जातकों में जन्म कुंडली के अनुसार पांचवें भाव की स्थिति भिन्न-भिन्न होती है।
यदि कुंभ राशि वाले जातक की कुंडली में 5वाँ भाव कन्या राशि में हो, तो इसके स्वामी बुध होंगे। बुध बुद्धि, विद्या तथा संतान की गुणवत्ता का कारक होता है। यदि बुध उच्च अथवा मित्र राशि में स्थित हो, तो संतान बुद्धिमान एवं गुणवान होगी। इसके विपरीत, यदि बुध नीच अथवा शत्रु राशि में स्थित हो, तो संतान संबंधी कष्ट अथवा विलंब की संभावना रहती है (BPHS 4.12)।
5वें भाव में स्थित ग्रहों के आधार पर संतान संबंधी अनेक संकेत मिलते हैं। उदाहरणार्थ, यदि 5वें भाव में बृहस्पति स्थित हो, तो जातक को संतान सुख की प्राप्ति शीघ्र होती है। यदि 5वें भाव में शनि स्थित हो, तो संतान प्राप्ति में विलंब अथवा कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है (Phaladeepika 7.14)।
गुरु (बृहस्पति) संतान, बुद्धि, धर्म तथा सुख का प्रमुख कारक ग्रह है। कुंभ राशि वालों के लिए गुरु की स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यदि गुरु कुंभ राशि में स्थित हो, तो जातक को संतान सुख की प्राप्ति शीघ्र होती है। गुरु की स्थिति कुंडली के किस भाव में है, इसके आधार पर संतान संबंधी अनेक संकेत मिलते हैं।
गुरु के उच्च अथवा मित्र राशि में स्थित होने पर संतान संबंधी योग अत्यंत शुभ होते हैं। इसके विपरीत, यदि गुरु नीच अथवा शत्रु राशि में स्थित हो, तो संतान संबंधी कष्ट अथवा विलंब की संभावना रहती है (BPHS 5.34)।
ज्योतिष शास्त्र में पुत्र एवं पुत्री प्राप्ति के लिए अलग-अलग योगों का वर्णन मिलता है। पुत्र प्राप्ति के लिए 5वें भाव में स्थित ग्रहों के साथ-साथ गुरु एवं सूर्य की स्थिति महत्वपूर्ण होती है। इसी प्रकार, पुत्री प्राप्ति के लिए चंद्रमा एवं शुक्र की स्थिति महत्वपूर्ण होती है।
इस प्रकार, 5वें भाव में स्थित ग्रहों के आधार पर जातक को पुत्र अथवा पुत्री प्राप्ति का संकेत मिलता है (Saravali 3.18-22)।
संतान प्राप्ति का समय जातक की कुंडली में स्थित दशाओं एवं अंतर्दशाओं के आधार पर निर्धारित किया जाता है। कुंभ राशि वालों के लिए मुख्य रूप से गुरु, चंद्रमा तथा शुक्र की दशाओं का विशेष महत्व होता है।
गुरु दशा कुंभ राशि वालों के लिए अत्यंत शुभ होती है। यदि गुरु दशा जातक की कुंडली में चल रही हो अथवा आने वाली हो, तो संतान प्राप्ति की संभावना अत्यंत प्रबल होती है। गुरु दशा की अवधि 16 वर्ष होती है, जिसके अंतर्गत जातक को संतान सुख की प्राप्ति हो सकती है (BPHS 32.1)।
चंद्र दशा भी संतान प्राप्ति के लिए महत्वपूर्ण होती है। यदि चंद्रमा 5वें भाव में स्थित हो अथवा 5वें भाव को दृष्ट कर रहा हो, तो चंद्र दशा के दौरान संतान प्राप्ति की संभावना रहती है। चंद्र दशा की अवधि 10 वर्ष होती है (BPHS 32.2)।
दशाओं के अंतर्गत आने वाली अंतर्दशाओं के आधार पर संतान प्राप्ति का समय निर्धारित किया जाता है। उदाहरणार्थ, यदि गुरु दशा के अंतर्गत शुक्र की अंतर्दशा चल रही हो, तो जातक को पुत्री प्राप्ति की संभावना रहती है। इसी प्रकार, यदि गुरु दशा के अंतर्गत मंगल की अंतर्दशा चल रही हो, तो जातक को पुत्र प्राप्ति की संभावना रहती है (Phaladeepika 8.25)।
ऊपर का लेख सामान्य स्थिति का है। आपकी कुंडली विशिष्ट है — कैरियर का समय, रिश्ते, स्वास्थ्य, जो भी पूछना चाहें।
अपनी कुंडली से पूछें →कभी-कभी कुंडली में ऐसे योग बन जाते हैं, जो संतान सुख में बाधा उत्पन्न करते हैं। ऐसे योगों का ज्ञान एवं उनके परिहार का ज्ञान अत्यंत आवश्यक है।
ऐसे योगों के परिहार के लिए ज्योतिष शास्त्र में अनेक उपायों का वर्णन मिलता है। उदाहरणार्थ, पंचम भाव में राहु अथवा केतु स्थित होने पर जातक को गुरु अथवा शुक्र की पूजा-अर्चना करनी चाहिए। इसी प्रकार, पंचम भाव में शनि स्थित होने पर जातक को शनि के बीज मंत्र का जाप करना चाहिए। गुरु के नीच अथवा शत्रु राशि में स्थित होने पर गुरु के बीज मंत्र का जाप लाभकारी होता है (Phaladeepika 7.42)।
नाड़ी दोष कुंडली मिलान का एक महत्वपूर्ण घटक है, जो विवाह एवं संतान संबंधी अनेक संकेत देता है। नाड़ी दोष का निर्माण जातक एवं उसकी जीवनसाथी की कुंडली में स्थित चंद्र राशि के आधार पर होता है। यदि दोनों की चंद्र राशि एक ही वर्ग अथवा एक ही नाड़ी में स्थित हों, तो नाड़ी दोष उत्पन्न होता है।
नाड़ी दोष के परिहार के लिए ज्योतिष शास्त्र में अनेक उपायों का वर्णन मिलता है। उदाहरणार्थ, नाड़ी दोष उत्पन्न होने पर जातक को अपने जीवनसाथी के साथ गुरु अथवा शुक्र की पूजा-अर्चना करनी चाहिए। इसी प्रकार, नाड़ी दोष के कारण उत्पन्न होने वाले कष्टों से बचने के लिए जातक को गुरु अथवा शुक्र के बीज मंत्रों का जाप करना चाहिए (Phaladeepika 8.32)।
ज्योतिष शास्त्र एक प्राचीन विज्ञान है, जो मनुष्य के जीवन के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन करता है। कुंडली में स्थित ग्रहों एवं योगों का अध्ययन कर हम अपने जीवन के संभावित मार्गों का अनुमान लगा सकते हैं। संतान योग भी इसी प्रकार का एक महत्वपूर्ण योग है, जो जातक की संतान-सुख की प्राप्ति, उसकी संख्या, गुणवत्ता तथा समयावधि का संकेत देता है।
हालाँकि, ज्योतिषीय योग केवल मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। यदि जातक को संतान संबंधी किसी प्रकार की कठिनाई हो रही हो, तो उसे चिकित्सकीय अथवा वैज्ञानिक परामर्श अवश्य लेना चाहिए। ज्योतिषीय योगों के आधार पर लिए गए निर्णयों के परिणाम सदैव सकारात्मक ही होंगे, यह आवश्यक नहीं है। अतः जातक को अपने जीवन के प्रत्येक पहलू में संतुलन बनाए रखना चाहिए तथा आवश्यकता पड़ने पर विशेषज्ञों से परामर्श लेना चाहिए।
कुंभ राशि वालों को संतान की प्राप्ति मुख्यतः गुरु दशा अथवा चंद्र दशा के दौरान होती है। यदि गुरु दशा चल रही हो अथवा आने वाली हो, तो संतान प्राप्ति की संभावना अत्यंत प्रबल होती है। इसके अतिरिक्त, यदि 5वाँ भाव अथवा 5वें भाव के स्वामी की दशा चल रही हो, तो भी संतान प्राप्ति की संभावना रहती है (BPHS 32.1)।
कुंभ राशि वालों के लिए संतान योग तब मजबूत होता है, जब 5वाँ भाव अथवा 5वें भाव के स्वामी उच्च अथवा मित्र राशि में स्थित हों। इसके अतिरिक्त, गुरु एवं चंद्रमा की दशा अथवा अंतर्दशा चल रही हो अथवा आने वाली हो, तो संतान योग अत्यंत शुभ होता है (BPHS 5.34)।
यदि कुंभ राशि वालों की कुंडली में 5वाँ भाव राहु अथवा केतु द्वारा दृष्ट किया गया हो अथवा 5वें भाव में स्थित हो, तो संतान संबंधी कष्ट अथवा विलंब की संभावना रहती है। ऐसे योग के परिहार के लिए गुरु अथवा शुक्र की पूजा-अर्चना एवं मंत्र जाप का विधान है (BPHS 3.56)।
यदि कुंभ राशि वालों की कुंडली में गुरु ग्रहण योग स्थित हो, अर्थात् गुरु किसी ग्रह द्वारा दृष्ट किया गया हो अथवा किसी ग्रह के साथ युति में स्थित हो, तो गुरु के प्रभाव में कमी अथवा विलंब हो सकता है। ऐसे योग के परिहार के लिए गुरु के बीज मंत्र "ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः" का जाप लाभकारी होता है (BPHS 5.34)।
कुंभ राशि वालों के लिए संतान प्राप्ति में सबसे महत्वपूर्ण ग्रह गुरु (बृहस्पति) है। गुरु
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