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मेष और मीन राशि के लिए अष्टकूट विश्लेषण देखें, mesh meen kundli milan के बारे में जानें और अपने विवाहित जीवन की संभावनाओं का आकलन करें, निःशुल्क देखें।
मेष और मीन के बीच भकूट दोष नहीं टिकता, क्योंकि दोनों राशियाँ 12/2 की स्थिति में होने पर भी मंगल और गुरु की मित्रता से परिहार पा जाती हैं। यानी इस जोड़ी में भकूट के 0 अंक मिलने के बावजूद कमी का असर पूरा नहीं रहता। नीचे इसे एक-एक कूट के साथ समझें।
कुंडली मिलान दो लोगों की जन्म-कुंडलियों को साथ रखकर उनकी अनुकूलता परखने की विधि है। हिंदू विवाह में इसे इसलिए देखा जाता है कि शादी सिर्फ़ दो लोगों का नहीं, दो स्वभावों और दो परिवारों का मेल है। इसमें अष्टकूट मिलान सबसे आम तरीका है, जिसमें आठ कसौटियाँ आती हैं।
एक बात पहले साफ़ कर दें: राशि जोड़ी से सिर्फ़ कुछ कूट तय होते हैं। बाकी कूट दोनों के जन्म नक्षत्र पर निर्भर हैं, इसलिए उनका पक्का नतीजा अपनी कुंडली से ही निकलता है।
मेष राशि चक्र की पहली राशि है, जिसका स्वामी मंगल है और तत्व अग्नि। मीन दूसरी राशि है, जिसका स्वामी गुरु है और तत्व जल। अग्नि और जल का मेल सीधा नहीं बैठता, पर यही फ़र्क इस जोड़ी को दिलचस्प भी बनाता है।
वर्ण (1 अंक): क्रम ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र का है। वर को 1 अंक तब मिलता है जब उसका वर्ण वधू के बराबर या ऊँचा हो। मेष क्षत्रिय है और मीन ब्राह्मण। अगर मेष वर की राशि हो तो 0 अंक मिलता है; अगर मीन वर की राशि हो तो 1 अंक।
वश्य (2 अंक): यह चंद्र राशि से तय होता है, जन्म नक्षत्र से नहीं। मेष चतुष्पद समूह में आती है और मीन जलचर समूह में। इस जोड़ी को वश्य के 2 में से 1 अंक मिलता है, वर किसी भी राशि का हो।
ग्रह मैत्री (5 अंक): मंगल गुरु को मित्र मानता है और गुरु मंगल को मित्र। इसलिए ग्रह मैत्री के पूरे 5 अंक मिलते हैं। यह इस जोड़ी का सबसे मज़बूत पक्ष है, क्योंकि स्वामी ग्रहों की आपसी मित्रता सोच और मूल्यों में तालमेल की ओर इशारा करती है।
भकूट (7 अंक): 2/12, 5/9 और 6/8 की स्थिति में 0 अंक मिलते हैं, बाकी स्थितियों में 7। मेष-मीन 12/2 पर पड़ती है, इसलिए इस जोड़ी को भकूट में 0 अंक मिलते हैं।
तारा (3 अंक), योनि (4 अंक), गण (6 अंक) और नाड़ी (8 अंक) राशि से नहीं, जन्म नक्षत्र से तय होते हैं। मेष में अश्विनी, भरणी और कृत्तिका का पहला पाद आता है, जबकि मीन में पूर्वा भाद्रपद का आख़िरी पाद, उत्तरा भाद्रपद और रेवती आते हैं। यानी एक ही राशि के भीतर अलग-अलग नक्षत्र हो सकते हैं, और इसी वजह से इन चार कूटों का नतीजा हर जोड़ी में अलग निकलता है। इनके लिए दोनों के सही जन्म नक्षत्र चाहिए।
राशि से तय कूटों का हिसाब इस तरह बनता है:
तारा, योनि, गण और नाड़ी जुड़ने के बाद ही 36 में से कुल अंक निकलते हैं। इसलिए यहाँ कोई कुल संख्या देना ग़लत होगा। कुल अंक जानने के लिए दोनों के जन्म नक्षत्र चाहिए।
ऊपर का लेख सामान्य स्थिति का है। आपकी कुंडली अलग है: विवाह का समय, रिश्ते, जो भी पूछना चाहें।
अपनी कुंडली मुफ़्त देखें →मेष-मीन की जोड़ी 12/2 की स्थिति में पड़ती है, जिसे द्विर्द्वादश योग कहा जाता है। इसलिए भकूट में 0 अंक मिलते हैं। पर कई परंपराओं में यह माना गया है कि अगर दोनों राशियों का स्वामी एक ही ग्रह हो, या दोनों स्वामी आपस में मित्र हों, तो भकूट दोष कट जाता है। इस जोड़ी में स्वामी मंगल और गुरु हैं, और वे एक-दूसरे के मित्र हैं। इसलिए यहाँ यह शर्त पूरी होती है और दोष का असर ज़्यादा नहीं रहता।
व्यवहार में इसका मतलब यह है कि सिर्फ़ भकूट के 0 अंक देखकर रिश्ता नहीं टालना चाहिए। परिहार की शर्त जाँचने के बाद ही नतीजा निकालें, और बाकी कूटों को भी साथ में देखें।
नाड़ी जन्म नक्षत्र से तय होती है, राशि से नहीं। इसलिए मेष या मीन राशि अपने आप में कोई नाड़ी नहीं देती। नाड़ी दोष तभी बनता है जब दोनों की नाड़ी एक ही हो। उस स्थिति में 8 में से 0 अंक मिलते हैं। अगर दोनों की नाड़ी अलग हो, तो पूरे अंक मिलते हैं।
चूँकि मेष और मीन दोनों में कई नक्षत्र आते हैं, इस जोड़ी में नाड़ी दोष बनेगा या नहीं, यह पूरी तरह दोनों के असली जन्म नक्षत्र पर टिका है। यह जाँच अपनी कुंडली से ही हो सकती है।
मेष का मंगल तेज़, सीधा और जल्दी फ़ैसला लेने वाला स्वभाव देता है। मीन का गुरु नरम, संवेदनशील और दूसरों की भावनाएँ समझने वाला मन देता है। दोनों के स्वामी मित्र हैं, इसलिए बुनियादी सोच अक्सर टकराती नहीं।
ग्रह मैत्री के पूरे अंक इस रिश्ते की नींव को मज़बूत मानने की वजह देते हैं। भकूट की कमी परिहार से संभल जाती है। लेकिन शादी की लंबी अवधि सिर्फ़ राशि जोड़ी पर नहीं, दोनों कुंडलियों में सप्तम भाव, उसके स्वामी, शुक्र और गुरु की स्थिति और चल रही दशा पर भी निर्भर करती है। इसलिए राशि-स्तर का मिलान सिर्फ़ शुरुआती तस्वीर है, अंतिम फ़ैसला नहीं।
अगर किसी कूट में अंक कम मिलें, तो परंपरा में इन बातों को देखकर संतुलन बनाया जाता है:
कौन-सा परिहार लगेगा, यह दोनों कुंडलियों को साथ देखकर ही तय होता है।
मंगल और गुरु की आपसी मित्रता के कारण ग्रह मैत्री के पूरे 5 अंक मिलते हैं, जो अच्छा संकेत है। भकूट के 0 अंक हैं, पर स्वामी मित्र होने से उसका परिहार बनता है। पूरा चित्र दोनों के जन्म नक्षत्र और कुंडलियों से ही साफ़ होगा।
इस जोड़ी में 12/2 की स्थिति बनती है, इसलिए भकूट में 0 अंक मिलते हैं। पर कई परंपराओं में स्वामी ग्रह आपस में मित्र हों तो दोष कट जाता है, और मंगल-गुरु मित्र हैं। इसलिए दोष का असर काफ़ी घट जाता है।
यह इस पर निर्भर करता है कि वर कौन-सी राशि का है। मेष वर हो तो 0 अंक और मीन वर हो तो 1 अंक मिलता है, क्योंकि वर का वर्ण वधू के बराबर या ऊँचा होना चाहिए।
मेष चतुष्पद और मीन जलचर समूह में है। इस जोड़ी को वश्य के 2 में से 1 अंक मिलता है, चाहे वर किसी भी राशि का हो।
अंक कुल 36 में से गिने जाते हैं, पर इस जोड़ी का कुल योग अभी नहीं बताया जा सकता। उसके लिए तारा, योनि, गण और नाड़ी के अंक चाहिए, जो दोनों के जन्म नक्षत्र से तय होते हैं।
नाड़ी दोष तब बनता है जब दोनों की नाड़ी एक ही हो। यह राशि से नहीं, जन्म नक्षत्र से तय होता है, इसलिए सिर्फ़ मेष-मीन जोड़ी देखकर इसका जवाब नहीं दिया जा सकता।
मेष अग्नि और मीन जल है, इसलिए स्वभाव में फ़र्क दिखता है। पर यह फ़र्क बाधा से ज़्यादा संतुलन का मौका है, खासकर जब दोनों के स्वामी ग्रह मित्र हों।
मांगलिक दोष की जाँच दोनों कुंडलियों में मंगल की भाव-स्थिति से होती है, सिर्फ़ राशि से नहीं। अगर दोनों कुंडलियों में मंगल दोष हो, तो कई परंपराओं में वे एक-दूसरे को संतुलित कर देते हैं। इसके लिए दोनों कुंडलियाँ साथ देखना ज़रूरी है।
दोनों की जन्म तारीख़, सही समय और जन्म स्थान चाहिए। इन्हीं से जन्म नक्षत्र और चंद्र राशि निकलती है, और तभी आठों कूट पूरे हो पाते हैं।
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