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मिथुन राशि के लिए संतान योग — पुत्र-पुत्री प्राप्ति विचार

मिथुन राशि के लिए संतान योग — पुत्र-पुत्री प्राप्ति विचार

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मिथुन राशि वालों के लिए संतान योग: शास्त्रीय विश्लेषण एवं मार्गदर्शन संतान योग कुंडली का एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं भावनात्मक पक्ष है, जिसका संबंध भावी पीढ़ी, पारिवारिक विस्तार और जीवन के स्थायी संबंधों से होता है। ज्योतिष शास्त्र में संतान योग के लिए मुख्य रूप से पंचम भाव, उसके स्वामी, तथा पंचमेश के साथ जुड़े ग्रहों की स्थिति और बल का विश्लेषण किया जाता है। पंचम भाव को संतान भाव कहा जाता है, जो मन, बुद्धि, संतान, धर्म, और संतोष का कारक माना गया है। साथ ही, गुरु (बृहस्पति) को संतान कारक ग्रह माना जाता है, जो संतान प्राप्ति, उसके गुण, शिक्षा, और सुख-समृद्धि का निर्धारण करता है। सप्तमेश (विवाह भाव का स्वामी) भी संतान योग में अप्रत्यक्ष रूप से भूमिका निभाता है, क्योंकि विवाह के माध्यम से ही संतान प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। मिथुन राशि वालों के लिए संतान योग का विश्लेषण करते समय, पंचम भाव की स्थिति, उसके स्वामी बुध, और गुरु की स्थिति पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इसके अतिरिक्त, दशा-अंतर्दशा के माध्यम से संतान प्राप्ति के समय का अनुमान लगाया जाता है। शास्त्रीय ग्रंथों में वर्णित नियमों का पालन करते हुए, हम मिथुन राशि वालों के लिए संतान योग का विस्तृत एवं संवेदनशील विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं। मिथुन राशि में पंचम भाव और उसके स्वामी बुध का विश्लेषण मिथुन राशि, जिसे जुड़वाँ राशि भी कहा जाता है, बुद्धि, संवाद, और विविधता का प्रतीक है। यह राशि बुध द्वारा शासित होती है, जो संचार, शिक्षा, और मन का कारक ग्रह है। जब मिथुन राशि वालों की कुंडली में पंचम भाव आता है, तो उनकी संतान से संबंधित बुद्धिमत्ता, सृजनात्मकता, और सीखने की क्षमता पर विशेष प्रभाव पड़ता है। यदि पंचम भाव मिथुन राशि में स्थित हो, तो जातक की संतान अत्यंत बुद्धिमान, चंचल, और बहुमुखी प्रतिभा वाली हो सकती है। ऐसे जातक अपनी संतानों के साथ संवाद में अधिक रुचि रखते हैं और उन्हें शिक्षा एवं कला के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। इसके अतिरिक्त, ऐसे जातक की संतानें स्वतंत्र विचारों वाली और विविध रुचियों वाली हो सकती हैं। पंचम भाव के स्वामी बुध की स्थिति भी महत्वपूर्ण है। यदि बुध उच्च राशि में स्थित हो, तो संतान प्राप्ति के योग अत्यंत मजबूत होते हैं। बुध यदि पंचम भाव से पंचम भाव में स्थित हो, तो स्वयं बुध को बल मिलता है, जिससे संतान सुख में वृद्धि होती है। इसके विपरीत, यदि बुध कमजोर स्थिति में हो, तो संतान प्राप्ति में विलंब या बाधाएँ आ सकती हैं। पंचम भाव में अन्य ग्रहों का प्रभाव पंचम भाव में स्थित ग्रहों के आधार पर संतान की प्रकृति और गुणों का अनुमान लगाया जाता है। निम्नलिखित ग्रहों के प्रभाव पर विचार करें: सूर्य: संतान में नेतृत्व गुण, आत्मविश्वास, और प्रतिष्ठा प्राप्त करने की क्षमता। चंद्र: संतान में भावनात्मक गहराई, संवेदनशीलता, और पारिवारिक प्रेम की भावना। मंगल: संतान में साहस, ऊर्जा, और प्रतिस्पर्धात्मक भावना। शुक्र: संतान में सौंदर्य, कला, संगीत, और प्रेम की भावना। शनि: संतान में गंभीरता, धैर्य, और जिम्मेदारी का भाव। राहु/केतु: असामान्य गुण, विदेश में रहने की संभावना, या अप्रत्याशित घटनाओं का प्रभाव। मिथुन राशि से गुरु की स्थिति: संतान कारक ग्रह का विश्लेषण गुरु (बृहस्पति) को संतान कारक ग्रह माना जाता है, क्योंकि यह बुद्धि, ज्ञान, धर्म, और संतान सुख का कारक है। गुरु की स्थिति और बल संतान प्राप्ति, उसकी शिक्षा, और उसके सुख-समृद्धि को निर्धारित करता है। मिथुन राशि वालों के लिए गुरु की स्थिति निम्न प्रकार से महत्वपूर्ण होती है: गुरु यदि मिथुन राशि में स्थित हो: ऐसे जातक को संतान प्राप्ति में अत्यंत लाभ होता है। गुरु की उच्च राशि में स्थिति बल प्रदान करती है, जिससे संतान सुख में वृद्धि होती है। ऐसे जातक की संतान अत्यंत बुद्धिमान, धार्मिक, और ज्ञानवान हो सकती है। गुरु यदि पंचम भाव में स्थित हो: गुरु का पंचम भाव में स्थित होना अत्यंत शुभ माना गया है। इससे जातक को संतान प्राप्ति के योग अत्यंत मजबूत होते हैं। ऐसे जातक की संतान धर्मिक, विद्वान, और सुखी होती है। गुरु यदि गुरुक्षेत्र (धनु या मीन राशि) में स्थित हो: गुरु की उच्च राशि में स्थिति अत्यंत शुभ होती है, जिससे संतान प्राप्ति के योग अत्यंत मजबूत होते हैं। ऐसे जातक को संतान सुख में वृद्धि होती है। गुरु यदि कमजोर स्थिति में हो: गुरु यदि राहु, केतु, या शनि के साथ स्थित हो, तो संतान प्राप्ति में विलंब या बाधाएँ आ सकती हैं। ऐसे जातक को संतान सुख प्राप्त करने के लिए गुरु को बल प्रदान करने के उपाय करने चाहिए। शास्त्रीय ग्रंथ फलदीपिका में गुरु के महत्व को स्पष्ट करते हुए कहा गया है: गुरु: संतान कारक: पुत्रद: पुत्रस्य बुद्धि: धर्मश्च गुरो: स्मृत:। अर्थात् गुरु संतान कारक ग्रह है। गुरु की स्थिति से पुत्र और पुत्री की बुद्धि तथा धर्म के प्रति उनकी रुचि का ज्ञान होता है। (फलदीपिका 7. 14) मिथुन राशि वालों के लिए पुत्र/पुत्री प्राप्ति के शास्त्रीय योग पुत्र प्राप्ति के योग पुत्र प्राप्ति के लिए निम्नलिखित योगों पर विचार किया जाता है: पंचम भाव में सूर्य, मंगल, या गुरु: ऐसे योग से जातक को पुत्र प्राप्ति होती है। सूर्य पुत्र कारक ग्रह है, मंगल साहस और ऊर्जा का प्रतीक है, और गुरु बुद्धि और ज्ञान का कारक है। पंचम भाव में चंद्र और गुरु: चंद्र मन और भावनाओं का कारक है, जबकि गुरु ज्ञान और धर्म का। ऐसे योग से जातक को संतान सुख प्राप्त होता है। गुरु पंचम भाव में स्थित हो और पंचमेश बुध बलवान हो: ऐसे योग से जातक को पुत्र प्राप्ति होती है। पुत्री प्राप्ति के योग पुत्री प्राप्ति के लिए निम्नलिखित योगों पर विचार किया जाता है: पंचम भाव में शुक्र, चंद्र, या गुरु: शुक्र सौंदर्य, कला, और प्रेम का कारक है, जबकि चंद्र मन और भावनाओं का। ऐसे योग से जातक को पुत्री प्राप्ति होती है। पंचम भाव में केतु: केतु विद्वत्ता, आध्यात्मिकता, और असामान्य गुणों का कारक है। केतु की स्थिति से जातक को पुत्री प्राप्ति होती है, जो विद्वान और आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाली हो सकती है। गुरु पंचम भाव में स्थित हो और पंचमेश बुध कमजोर हो: ऐसे योग से जातक को पुत्री प्राप्ति होती है। शास्त्रीय ग्रंथ बृहत् पाराशर होरा शास्त्र में पुत्र और पुत्री प्राप्ति के योगों का वर्णन करते हुए कहा गया है: पंचमस्थो गुरु: पुत्रान् ददाति पुत्रिकां च य:। अर्थात् पंचम भाव में स्थित गुरु जातक को पुत्र और पुत्री दोनों प्रदान करता है। (BPHS 3. 42) मिथुन राशि वालों के लिए संतान प्राप्ति का समय: दशा-अंतर्दशा का प्रभाव संतान प्राप्ति का समय जानने के लिए दशा-अंतर्दशा प्रणाली का विश्लेषण किया जाता है। दशाओं के माध्यम से जातक के जीवन के विभिन्न चरणों में घटित होने वाली घटनाओं का अनुमान लगाया जाता है। संतान प्राप्ति के लिए मुख्य रूप से गुरु दशा, बुध दशा, और चंद्र दशा का विश्लेषण किया जाता है। गुरु दशा में संतान प्राप्ति गुरु दशा संतान प्राप्ति के लिए सर्वाधिक शुभ मानी जाती है। यदि जातक की कुंडली में गुरु बलवान स्थिति में हो, तो गुरु दशा के दौरान संतान प्राप्ति की संभावना अत्यंत प्रबल होती है। गुरु दशा की अवधि 16 वर्ष होती है, और इसकी अंतर्दशाओं के अंतर्गत संतान प्राप्ति हो सकती है। उदाहरण के लिए, यदि जातक की गुरु दशा 25 वर्ष की आयु में शुरू होती है और उसकी कुंडली में गुरु बलवान स्थिति में हो, तो गुरु की अंतर्दशा (जो 3 वर्ष 4 माह की होती है) के दौरान संतान प्राप्ति की संभावना होती है। बुध दशा में संतान प्राप्ति बुध दशा मिथुन राशि वालों के लिए महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि बुध उनकी राशि का स्वामी है। यदि बुध दशा के दौरान पंचम भाव में स्थित ग्रह बलवान हो, तो संतान प्राप्ति की संभावना होती है। बुध दशा की अवधि 17 वर्ष होती है, और इसकी अंतर्दशाओं के अंतर्गत संतान प्राप्ति हो सकती है। चंद्र दशा में संतान प्राप्ति चंद्र दशा भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक कारकों से संबंधित होती है। यदि जातक की कुंडली में चंद्र बलवान स्थिति में हो और चंद्र दशा के दौरान पंचम भाव में स्थित ग्रह बलवान हो, तो संतान प्राप्ति की संभावना होती है। चंद्र दशा की अवधि 10 वर्ष होती है। शास्त्रीय ग्रंथ सारावली में दशाओं के प्रभाव का वर्णन करते हुए कहा गया है: गुरोर्दशासु पुत्रार्थे फलं पुत्रफलं स्मृतम्। अर्थात् गुरु दशा के दौरान पुत्र प्राप्ति का फल मिलता है। (सारावली 12. 15) मिथुन राशि वालों के लिए संतान सुख में बाधा के योग और उनके शास्त्रीय परिहार कभी-कभी कुंडली में ऐसे योग उत्पन्न होते हैं, जो संतान सुख में बाधा उत्पन्न करते हैं। इन बाधाओं को दूर करने के लिए शास्त्रीय परिहारों का वर्णन किया गया है। संतान सुख में बाधा के प्रमुख योग पंचम भाव में शनि: शनि पंचम भाव में स्थित हो, तो संतान प्राप्ति में विलंब या बाधा आ सकती है। शनि कठोरता, नियम, और विलंब का कारक है, जो संतान प्राप्ति में बाधा उत्पन्न कर सकता है। पंचम भाव में राहु या केतु: राहु और केतु अशुभ ग्रह माने जाते हैं, जो संतान प्राप्ति में बाधा उत्पन्न कर सकते हैं। ऐसे योग से संतान असामान्य गुणों वाली हो सकती है या संतान प्राप्ति में विलंब हो सकता है। गुरु पंचम भाव में स्थित न हो और पंचमेश कमजोर हो: गुरु का पंचम भाव में स्थित न होना संतान प्राप्ति के योग को कमजोर कर सकता है। नाड़ी दोष: यदि जातक की कुंडली में नाड़ी दोष हो, तो संतान प्राप्ति में बाधा उत्पन्न हो सकती है। संतान सुख में बाधा दूर करने के शास्त्रीय उपाय गुरु का उपासना: गुरु को बल प्रदान करने के लिए गुरुवार को पीले वस्त्र धारण करें, गुरु मंत्र "ॐ गुरवे नम:" का जाप करें, और गुरु ग्रह को बल प्रदान करने वाले रत्न (पुखराज) का उपयोग करें। बुध का उपासना: बुध को बल प्रदान करने के लिए बुधवार को हरे वस्त्र धारण करें, बुध मंत्र "ॐ बुधाय नम:" का जाप करें, और बुध ग्रह को बल प्रदान करने वाले रत्न (पन्ना) का उपयोग करें। पंचम भाव की पूजा: पंचम भाव की शांति के लिए भगवान श्रीकृष्ण, भगवान गणेश, या देव गुरु Brihaspati की पूजा करें। दान-पुण्य: संतान सुख प्राप्ति के लिए पीले वस्त्र, चने, और गुड़ का दान करें। मंत्र जाप: "ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं गं गणपतये वर वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा:" मंत्र का जाप करें। शास्त्रीय ग्रंथ जातक पारिजात में संतान सुख में बाधा दूर करने के उपायों का वर्णन करते हुए कहा गया है: पंचमेशे बलवान् भूत्वा पुत्रान् ददाति नान्यथा। अर्थात् पंचम भाव के स्वामी को बलवान बनाने से जातक को संतान प्राप्ति होती है, अन्यथा नहीं। (जातक पारिजात 18.

मिथुन राशि वालों के लिए संतान योग: शास्त्रीय विश्लेषण एवं मार्गदर्शन

संतान योग कुंडली का एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं भावनात्मक पक्ष है, जिसका संबंध भावी पीढ़ी, पारिवारिक विस्तार और जीवन के स्थायी संबंधों से होता है। ज्योतिष शास्त्र में संतान योग के लिए मुख्य रूप से पंचम भाव, उसके स्वामी, तथा पंचमेश के साथ जुड़े ग्रहों की स्थिति और बल का विश्लेषण किया जाता है। पंचम भाव को संतान भाव कहा जाता है, जो मन, बुद्धि, संतान, धर्म, और संतोष का कारक माना गया है। साथ ही, गुरु (बृहस्पति) को संतान कारक ग्रह माना जाता है, जो संतान प्राप्ति, उसके गुण, शिक्षा, और सुख-समृद्धि का निर्धारण करता है। सप्तमेश (विवाह भाव का स्वामी) भी संतान योग में अप्रत्यक्ष रूप से भूमिका निभाता है, क्योंकि विवाह के माध्यम से ही संतान प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

मिथुन राशि वालों के लिए संतान योग का विश्लेषण करते समय, पंचम भाव की स्थिति, उसके स्वामी बुध, और गुरु की स्थिति पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इसके अतिरिक्त, दशा-अंतर्दशा के माध्यम से संतान प्राप्ति के समय का अनुमान लगाया जाता है। शास्त्रीय ग्रंथों में वर्णित नियमों का पालन करते हुए, हम मिथुन राशि वालों के लिए संतान योग का विस्तृत एवं संवेदनशील विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं।

मिथुन राशि में पंचम भाव और उसके स्वामी बुध का विश्लेषण

मिथुन राशि, जिसे जुड़वाँ राशि भी कहा जाता है, बुद्धि, संवाद, और विविधता का प्रतीक है। यह राशि बुध द्वारा शासित होती है, जो संचार, शिक्षा, और मन का कारक ग्रह है। जब मिथुन राशि वालों की कुंडली में पंचम भाव आता है, तो उनकी संतान से संबंधित बुद्धिमत्ता, सृजनात्मकता, और सीखने की क्षमता पर विशेष प्रभाव पड़ता है।

यदि पंचम भाव मिथुन राशि में स्थित हो, तो जातक की संतान अत्यंत बुद्धिमान, चंचल, और बहुमुखी प्रतिभा वाली हो सकती है। ऐसे जातक अपनी संतानों के साथ संवाद में अधिक रुचि रखते हैं और उन्हें शिक्षा एवं कला के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। इसके अतिरिक्त, ऐसे जातक की संतानें स्वतंत्र विचारों वाली और विविध रुचियों वाली हो सकती हैं।

पंचम भाव के स्वामी बुध की स्थिति भी महत्वपूर्ण है। यदि बुध उच्च राशि में स्थित हो, तो संतान प्राप्ति के योग अत्यंत मजबूत होते हैं। बुध यदि पंचम भाव से पंचम भाव में स्थित हो, तो स्वयं बुध को बल मिलता है, जिससे संतान सुख में वृद्धि होती है। इसके विपरीत, यदि बुध कमजोर स्थिति में हो, तो संतान प्राप्ति में विलंब या बाधाएँ आ सकती हैं।

पंचम भाव में अन्य ग्रहों का प्रभाव

पंचम भाव में स्थित ग्रहों के आधार पर संतान की प्रकृति और गुणों का अनुमान लगाया जाता है। निम्नलिखित ग्रहों के प्रभाव पर विचार करें:

मिथुन राशि से गुरु की स्थिति: संतान कारक ग्रह का विश्लेषण

गुरु (बृहस्पति) को संतान कारक ग्रह माना जाता है, क्योंकि यह बुद्धि, ज्ञान, धर्म, और संतान सुख का कारक है। गुरु की स्थिति और बल संतान प्राप्ति, उसकी शिक्षा, और उसके सुख-समृद्धि को निर्धारित करता है।

मिथुन राशि वालों के लिए गुरु की स्थिति निम्न प्रकार से महत्वपूर्ण होती है:

शास्त्रीय ग्रंथ फलदीपिका में गुरु के महत्व को स्पष्ट करते हुए कहा गया है:

गुरु: संतान कारक: पुत्रद: पुत्रस्य बुद्धि: धर्मश्च गुरो: स्मृत:।

अर्थात् गुरु संतान कारक ग्रह है। गुरु की स्थिति से पुत्र और पुत्री की बुद्धि तथा धर्म के प्रति उनकी रुचि का ज्ञान होता है।

(फलदीपिका 7.14)

ऊपर का लेख सामान्य स्थिति का है। आपकी कुंडली विशिष्ट है — कैरियर का समय, रिश्ते, स्वास्थ्य, जो भी पूछना चाहें।

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मिथुन राशि वालों के लिए पुत्र/पुत्री प्राप्ति के शास्त्रीय योग

पुत्र प्राप्ति के योग

पुत्र प्राप्ति के लिए निम्नलिखित योगों पर विचार किया जाता है:

पुत्री प्राप्ति के योग

पुत्री प्राप्ति के लिए निम्नलिखित योगों पर विचार किया जाता है:

शास्त्रीय ग्रंथ बृहत् पाराशर होरा शास्त्र में पुत्र और पुत्री प्राप्ति के योगों का वर्णन करते हुए कहा गया है:

पंचमस्थो गुरु: पुत्रान् ददाति पुत्रिकां च य:।

अर्थात् पंचम भाव में स्थित गुरु जातक को पुत्र और पुत्री दोनों प्रदान करता है।

(BPHS 3.42)

मिथुन राशि वालों के लिए संतान प्राप्ति का समय: दशा-अंतर्दशा का प्रभाव

संतान प्राप्ति का समय जानने के लिए दशा-अंतर्दशा प्रणाली का विश्लेषण किया जाता है। दशाओं के माध्यम से जातक के जीवन के विभिन्न चरणों में घटित होने वाली घटनाओं का अनुमान लगाया जाता है। संतान प्राप्ति के लिए मुख्य रूप से गुरु दशा, बुध दशा, और चंद्र दशा का विश्लेषण किया जाता है।

गुरु दशा में संतान प्राप्ति

गुरु दशा संतान प्राप्ति के लिए सर्वाधिक शुभ मानी जाती है। यदि जातक की कुंडली में गुरु बलवान स्थिति में हो, तो गुरु दशा के दौरान संतान प्राप्ति की संभावना अत्यंत प्रबल होती है। गुरु दशा की अवधि 16 वर्ष होती है, और इसकी अंतर्दशाओं के अंतर्गत संतान प्राप्ति हो सकती है।

उदाहरण के लिए, यदि जातक की गुरु दशा 25 वर्ष की आयु में शुरू होती है और उसकी कुंडली में गुरु बलवान स्थिति में हो, तो गुरु की अंतर्दशा (जो 3 वर्ष 4 माह की होती है) के दौरान संतान प्राप्ति की संभावना होती है।

बुध दशा में संतान प्राप्ति

बुध दशा मिथुन राशि वालों के लिए महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि बुध उनकी राशि का स्वामी है। यदि बुध दशा के दौरान पंचम भाव में स्थित ग्रह बलवान हो, तो संतान प्राप्ति की संभावना होती है। बुध दशा की अवधि 17 वर्ष होती है, और इसकी अंतर्दशाओं के अंतर्गत संतान प्राप्ति हो सकती है।

चंद्र दशा में संतान प्राप्ति

चंद्र दशा भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक कारकों से संबंधित होती है। यदि जातक की कुंडली में चंद्र बलवान स्थिति में हो और चंद्र दशा के दौरान पंचम भाव में स्थित ग्रह बलवान हो, तो संतान प्राप्ति की संभावना होती है। चंद्र दशा की अवधि 10 वर्ष होती है।

शास्त्रीय ग्रंथ सारावली में दशाओं के प्रभाव का वर्णन करते हुए कहा गया है:

गुरोर्दशासु पुत्रार्थे फलं पुत्रफलं स्मृतम्।

अर्थात् गुरु दशा के दौरान पुत्र प्राप्ति का फल मिलता है।

(सारावली 12.15)

मिथुन राशि वालों के लिए संतान सुख में बाधा के योग और उनके शास्त्रीय परिहार

कभी-कभी कुंडली में ऐसे योग उत्पन्न होते हैं, जो संतान सुख में बाधा उत्पन्न करते हैं। इन बाधाओं को दूर करने के लिए शास्त्रीय परिहारों का वर्णन किया गया है।

संतान सुख में बाधा के प्रमुख योग

संतान सुख में बाधा दूर करने के शास्त्रीय उपाय

शास्त्रीय ग्रंथ जातक पारिजात में संतान सुख में बाधा दूर करने के उपायों का वर्णन करते हुए कहा गया है:

पंचमेशे बलवान् भूत्वा पुत्रान् ददाति नान्यथा।

अर्थात् पंचम भाव के स्वामी को बलवान बनाने से जातक को संतान प्राप्ति होती है, अन्यथा नहीं।

(जातक पारिजात 18.23)

नाड़ी दोष का संतान पर प्रभाव

नाड़ी दोष कुंडली में एक महत्वपूर्ण और चर्चित योग है, जो विवाह और संतान प्राप्ति में बाधा उत्पन्न कर सकता है। नाड़ी दोष का संबंध जातक के जन्म नक्षत्र और उसके माता-पिता के जन्म नक्षत्र से होता है। यदि दोनों के नक्षत्र समान जातक (गोत्र) के हों, तो नाड़ी दोष उत्पन्न होता है।

नाड़ी दोष के कारण विवाह में विलंब, संतान प्राप्ति में बाधा, या वैवाहिक जीवन में कलह उत्पन्न हो सकती है। मिथुन राशि वालों के लिए नाड़ी दोष विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि मिथुन राशि का स्वामी बुध है, जो संचार और विवाह का कारक ग्रह है।

नाड़ी दोष दूर करने के लिए मुख्य रूप से कुंडली मिलान (अष्टकूट मिलान) में नाड़ी दोष का ध्यान रखा जाता है। यदि कुंडली मिलान में नाड़ी दोष हो, तो

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