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तुला और तुला राशि के बीच कुंडली मिलान का विश्लेषण करें और जानें कि आपके विवाहित जीवन में सुख, समृद्धि और संतुलन बना रहेगा या नहीं।
तुला और तुला की जोड़ी में दोनों का स्वामी शुक्र है और दोनों वायु तत्व की राशि हैं, इसलिए यह मिलान सुनने में ही सहज लगता है। कुंडली मिलान दो लोगों के जन्म नक्षत्र और चंद्र राशि को आठ कसौटियों पर परखने की परंपरा है। इसका मक़सद यह देखना है कि दोनों का स्वभाव, सोच और रोज़ की लय कितनी मेल खाती है।
हिंदू विवाह में इसे इसलिए अहम माना गया कि शादी दो परिवारों और बरसों के साथ का फ़ैसला है। मिलान कोई फ़ैसला नहीं सुनाता, यह बस बताता है कि कहाँ तालमेल सहज होगा और कहाँ थोड़ा ध्यान देना पड़ेगा। आगे हम इसी जोड़ी को हर कसौटी पर देखेंगे।
अष्टकूट में कुल आठ कूट हैं: वर्ण, वश्य, तारा, योनि, ग्रह मैत्री, गण, भकूट और नाड़ी। इनमें से कुछ राशि से तय होते हैं और कुछ सीधे जन्म नक्षत्र से। इस फ़र्क़ को समझना ज़रूरी है, वरना गलत नतीजे निकल आते हैं।
तारा (3 अंक), योनि (4 अंक), गण (6 अंक) और नाड़ी (8 अंक) राशि से नहीं, दोनों के जन्म नक्षत्र से तय होते हैं। तुला राशि में चित्रा के अंतिम दो चरण, स्वाति के चारों चरण और विशाखा के पहले तीन चरण आते हैं (BPHS 46.7)। यानी तुला के दो लोगों के नक्षत्र अलग हो सकते हैं, और तभी इन चारों कूटों के अंक अलग-अलग निकलते हैं। इसलिए इन चारों की बात बिना नक्षत्र जाने करना सही नहीं होगा।
राशि से तय होने वाले कूटों का हिसाब यह है: वर्ण 1, वश्य 2, ग्रह मैत्री 5 और भकूट 7। ये चारों इस जोड़ी में पूरे अंक देते हैं। यह बहुत अच्छी शुरुआत है।
पर कुल अंक अभी नहीं बताया जा सकता। इसलिए अपना पूरा स्कोर जानने के लिए दोनों के जन्म नक्षत्र चाहिए।
भकूट दोष तब बनता है जब दोनों राशियों के बीच का संबंध 2/12, 5/9 या 6/8 हो। इन तीनों पर भकूट के 0 अंक मिलते हैं, बाक़ी पर 7। तुला-तुला का संबंध 1/1 है, यानी इन तीनों में से कोई नहीं। इसलिए इस जोड़ी में भकूट दोष बनता ही नहीं और 7 में से 7 अंक मिलते हैं।
तुला का संबंध किसी और राशि से हो और वहाँ दोष बन भी जाए, तो कई परंपराओं में दोनों राशियों का स्वामी एक ही ग्रह होने या आपस में मित्र होने पर दोष कट जाता है। तुला-तुला में वैसे भी इसकी ज़रूरत नहीं पड़ती।
नाड़ी दोष राशि से नहीं, जन्म नक्षत्र से तय होता है। यह तब बनता है जब वर और वधू की नाड़ी एक ही हो, और तब नाड़ी के 8 अंक नहीं मिलते। तुला राशि में एक से ज़्यादा नक्षत्र आते हैं, इसलिए दो तुला जातकों की नाड़ी एक भी हो सकती है और अलग भी। इस जोड़ी के बारे में पहले से कुछ कहना ग़लत होगा।
अगर नाड़ी एक निकले, तो घबराने की ज़रूरत नहीं। शास्त्रीय परंपरा में इसके परिहार माने गए हैं, जैसे दोनों का नक्षत्र एक होकर चरण अलग होना, या दोनों की राशि का स्वामी एक ही होना। इन्हें कुंडली देखकर ही लागू किया जाता है।
ऊपर का लेख सामान्य स्थिति का है। आपकी कुंडली अलग है: विवाह का समय, रिश्ते, जो भी पूछना चाहें।
अपनी कुंडली मुफ़्त देखें →दोनों वायु तत्व और शुक्र के स्वामित्व वाली राशि के हैं, तो सोचने का ढंग काफ़ी मिलता है। बातचीत, संतुलन और रिश्तों में सुकून की चाह दोनों में होती है। शुक्र सुंदरता, तालमेल और साथ का कारक है, इसलिए यह जोड़ी बातचीत से हर उलझन सुलझाने में सहज रहती है।
एक बारीक बात यह है कि दोनों एक जैसे हैं, इसलिए फ़ैसले लेने में दोनों हिचक सकते हैं। तुला तराज़ू की राशि है और तौलने में वक़्त लगता है। ऐसे में घर के छोटे-बड़े फ़ैसले टलते रह सकते हैं। एक-दूसरे को साफ़ राय देना इस जोड़ी की सबसे बड़ी सीख है।
राशि के स्तर पर यह जोड़ी मज़बूत है, क्योंकि ग्रह मैत्री और भकूट दोनों पूरे अंक देते हैं। इसका मतलब है कि आपसी समझ और साथ चलने का आधार अच्छा है। पर लंबे साथ का असली हाल कुंडलियों में ग्रहों की स्थिति और दशा पर भी निर्भर करता है, सिर्फ़ मिलान के अंकों पर नहीं।
अगर तारा, योनि, गण या नाड़ी में अंक कम आएँ, तो पहले यह देखा जाता है कि क्या कोई परिहार लागू होता है। दोनों राशियों का स्वामी एक होना यहाँ आपके पक्ष में है, क्योंकि कई परंपराओं में इससे कुछ दोष हल्के माने जाते हैं।
शुक्र की पूजा या शुक्रवार का व्रत जैसे उपाय सहायक माने जाते हैं, पर इन्हें मुख्य इलाज नहीं समझना चाहिए। पहले विश्लेषण, फिर समय, उपाय सबसे आख़िर में।
राशि के स्तर पर यह बहुत सहज जोड़ी है। दोनों के स्वामी एक ही ग्रह शुक्र होने से ग्रह मैत्री के 5 में से 5 और भकूट के 7 में से 7 अंक मिलते हैं। बाक़ी अंक दोनों के जन्म नक्षत्र पर निर्भर हैं।
अलग-अलग परंपराओं में अलग सीमा मानी जाती है, पर सिर्फ़ कुल अंक पर टिकना ठीक नहीं। भकूट और नाड़ी जैसे भारी कूटों की स्थिति ज़्यादा मायने रखती है। इस जोड़ी का कुल अंक जानने के लिए दोनों के जन्म नक्षत्र चाहिए।
नहीं। दोनों राशियाँ एक ही हैं, यानी 1/1 का संबंध है, जो 2/12, 5/9 और 6/8 में नहीं आता। इसलिए भकूट के पूरे 7 अंक मिलते हैं।
जब वर और वधू की नाड़ी एक ही हो। यह जन्म नक्षत्र से तय होता है, राशि से नहीं, इसलिए तुला राशि वालों में यह एक भी निकल सकती है और अलग भी।
पहले दोनों कुंडलियों में मंगल की स्थिति साथ-साथ देखी जाती है। कई बार दोनों तरफ़ दोष होने पर वह आपस में संतुलित माना जाता है। अकेले एक तरफ़ दोष हो तो कुंडली देखकर ही उपाय तय करना ठीक रहता है।
राशि का स्वामी एक होने से मित्रता और आपसी समझ अच्छी रहती है। पर एक जैसे स्वभाव में फ़ैसले टलने जैसी बारीकी भी आ सकती है, इसलिए खुलकर राय रखना मदद करता है।
वश्य चंद्र राशि से तय होता है और आपसी असर या नियंत्रण का भाव दिखाता है। तुला मानव (नर) समूह में आती है, और दोनों इसी समूह के हैं, इसलिए 2 में से 2 अंक मिलते हैं।
तुला का वर्ण शूद्र है। वर का वर्ण वधू के बराबर या ऊँचा हो तो 1 अंक मिलता है। यहाँ दोनों बराबर हैं, इसलिए 1 अंक मिलता है।
दोनों की सही जन्म तारीख़, समय और जगह चाहिए। उसी से जन्म नक्षत्र, तारा, योनि, गण और नाड़ी निकलते हैं और पूरा स्कोर बनता है।
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