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वश्य दोष क्या है और कुंडली में इसका निर्माण कैसे होता है वश्य दोष एक ऐसा योग है जो कुंडली में ग्रहों के आपसी संबंधों से उत्पन्न होता है। जब कोई ग्रह अपनी राशि, स्वभाव अथवा स्थिति के कारण किसी अन्य ग्रह अथवा भाव पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर लेता है, तब वश्य दोष का निर्माण होता है। इस दोष का प्रमुख कारण ग्रहों की आपसी दृष्टि अथवा शत्रु-मित्र संबंध होता है। विशेष रूप से, यदि कोई ग्रह दूसरे ग्रह अथवा भाव के स्वामी को पराजित कर देता है अथवा उसे अपने अधीन कर लेता है, तो वश्य दोष उत्पन्न होता है। वश्य दोष के निर्माण में ग्रहों की स्थिति , दृष्टि , योगकारकता तथा नक्षत्र दशा महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उदाहरण के लिए, यदि मंगल (अग्नि तत्व) सिंह राशि में स्थित होकर चंद्रमा (मन) को प्रभावित करता है, तो मन पर अग्नि तत्व का प्रभाव बढ़ जाता है, जिससे व्यक्ति के व्यवहार में आक्रामकता अथवा असंतुलन उत्पन्न हो सकता है। वश्य दोष निर्माण के प्रमुख कारक ग्रहों की दृष्टि: केंद्रीय भावों (1, 4, 7, 10) अथवा त्रिकोण भावों (1, 5, 9) से किसी ग्रह द्वारा दूसरे ग्रह अथवा भाव पर दृष्टि डालने से वश्य दोष उत्पन्न होता है। (BPHS 3. 42) राशि स्वामी का प्रभाव: यदि कोई ग्रह दूसरे ग्रह के राशि स्वामी पर दृष्टि डालता है अथवा उसे अपने अधीन करता है, तो वश्य दोष निर्मित होता है। नक्षत्र दशा: किसी ग्रह की दशा अथवा अंतरदशा में जब दूसरा ग्रह प्रभावी होता है, तब भी वश्य दोष उत्पन्न हो सकता है। (BPHS 57. 4-5) योगकारक ग्रहों का संयोग: यदि योगकारक ग्रह (जैसे गुरु अथवा शुक्र) किसी कमजोर ग्रह को अपने प्रभाव में ले लेता है, तो वश्य दोष निर्मित होता है। वैदिक ग्रंथों में वश्य दोष की शास्त्रीय परिभाषा वश्य दोष का वर्णन सर्वप्रथम बृहत् पाराशर होरा शास्त्र तथा फलदीपिका जैसे ग्रंथों में मिलता है। इन ग्रंथों में वश्य दोष को "ग्रहाणाम् अधीनत्वम्" अथवा "ग्रहाणाम् वश्यत्वम्" के रूप में परिभाषित किया गया है, अर्थात् किसी ग्रह द्वारा दूसरे ग्रह अथवा भाव पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना। बृहत् पाराशर होरा शास्त्र (BPHS) में वर्णन BPHS के अनुसार, जब कोई ग्रह अपने बल अथवा स्थिति के कारण दूसरे ग्रह अथवा भाव को अपने अधीन कर लेता है, तब वश्य दोष निर्मित होता है। विशेष रूप से, यदि कोई ग्रह दूसरे ग्रह के लग्न भाव , व्यवसाय भाव (10वां भाव) अथवा पति-पत्नी भाव (7वां भाव) पर प्रभावी दृष्टि डालता है, तो वश्य दोष उत्पन्न होता है। (BPHS 3. 42) BPHS में यह भी बताया गया है कि वश्य दोष के प्रभाव को कम करने के लिए विशेष उपाय जैसे मंत्र जाप, हवन अथवा दान का विधान है। विशेष रूप से, श्री विष्णु सहस्रनाम अथवा श्रीमद्भागवतम् का पाठ करने से इस दोष के कुप्रभावों में कमी आती है। फलदीपिका में वर्णन फलदीपिका के अनुसार, वश्य दोष का निर्माण तब होता है जब कोई ग्रह दूसरे ग्रह अथवा भाव के स्वामी को अपने प्रभाव में ले लेता है। विशेष रूप से, जब किसी व्यक्ति की कुंडली में मंगल अथवा शनि प्रभावी होते हैं और वे चंद्रमा अथवा शुक्र जैसे ग्रहों पर प्रभाव डालते हैं, तब वश्य दोष निर्मित होता है। (Phaladeepika 7.
वश्य दोष एक ऐसा योग है जो कुंडली में ग्रहों के आपसी संबंधों से उत्पन्न होता है। जब कोई ग्रह अपनी राशि, स्वभाव अथवा स्थिति के कारण किसी अन्य ग्रह अथवा भाव पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर लेता है, तब वश्य दोष का निर्माण होता है। इस दोष का प्रमुख कारण ग्रहों की आपसी दृष्टि अथवा शत्रु-मित्र संबंध होता है। विशेष रूप से, यदि कोई ग्रह दूसरे ग्रह अथवा भाव के स्वामी को पराजित कर देता है अथवा उसे अपने अधीन कर लेता है, तो वश्य दोष उत्पन्न होता है।
वश्य दोष के निर्माण में ग्रहों की स्थिति, दृष्टि, योगकारकता तथा नक्षत्र दशा महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उदाहरण के लिए, यदि मंगल (अग्नि तत्व) सिंह राशि में स्थित होकर चंद्रमा (मन) को प्रभावित करता है, तो मन पर अग्नि तत्व का प्रभाव बढ़ जाता है, जिससे व्यक्ति के व्यवहार में आक्रामकता अथवा असंतुलन उत्पन्न हो सकता है।
वश्य दोष का वर्णन सर्वप्रथम बृहत् पाराशर होरा शास्त्र तथा फलदीपिका जैसे ग्रंथों में मिलता है। इन ग्रंथों में वश्य दोष को "ग्रहाणाम् अधीनत्वम्" अथवा "ग्रहाणाम् वश्यत्वम्" के रूप में परिभाषित किया गया है, अर्थात् किसी ग्रह द्वारा दूसरे ग्रह अथवा भाव पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना।
BPHS के अनुसार, जब कोई ग्रह अपने बल अथवा स्थिति के कारण दूसरे ग्रह अथवा भाव को अपने अधीन कर लेता है, तब वश्य दोष निर्मित होता है। विशेष रूप से, यदि कोई ग्रह दूसरे ग्रह के लग्न भाव, व्यवसाय भाव (10वां भाव) अथवा पति-पत्नी भाव (7वां भाव) पर प्रभावी दृष्टि डालता है, तो वश्य दोष उत्पन्न होता है। (BPHS 3.42)
BPHS में यह भी बताया गया है कि वश्य दोष के प्रभाव को कम करने के लिए विशेष उपाय जैसे मंत्र जाप, हवन अथवा दान का विधान है। विशेष रूप से, श्री विष्णु सहस्रनाम अथवा श्रीमद्भागवतम् का पाठ करने से इस दोष के कुप्रभावों में कमी आती है।
फलदीपिका के अनुसार, वश्य दोष का निर्माण तब होता है जब कोई ग्रह दूसरे ग्रह अथवा भाव के स्वामी को अपने प्रभाव में ले लेता है। विशेष रूप से, जब किसी व्यक्ति की कुंडली में मंगल अथवा शनि प्रभावी होते हैं और वे चंद्रमा अथवा शुक्र जैसे ग्रहों पर प्रभाव डालते हैं, तब वश्य दोष निर्मित होता है। (Phaladeepika 7.14)
फलदीपिका में यह भी बताया गया है कि वश्य दोष के कारण व्यक्ति के व्यवहार में कठोरता अथवा असंतुलन उत्पन्न हो सकता है। ऐसे जातकों को अपने व्यवहार में संयम रखने तथा धार्मिक अनुष्ठानों का पालन करने की सलाह दी जाती है।
वश्य दोष की पहचान करने के लिए निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान दें:
निम्नलिखित ग्रह संयोगों से वश्य दोष निर्मित हो सकता है:
ऊपर का लेख सामान्य स्थिति का है। आपकी कुंडली विशिष्ट है — कैरियर का समय, रिश्ते, स्वास्थ्य, जो भी पूछना चाहें।
अपनी कुंडली से पूछें →हल्के वश्य दोष के लक्षण निम्नलिखित हैं:
मध्यम वश्य दोष के लक्षण निम्नलिखित हैं:
गंभीर वश्य दोष के लक्षण निम्नलिखित हैं:
वश्य दोष का विवाह पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ सकता है:
वश्य दोष का करियर पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ सकता है:
वश्य दोष का स्वास्थ्य पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ सकता है:
यह एक सामान्य भ्रांति है कि हर व्यक्ति की कुंडली में वश्य दोष होता है। वास्तव में, वश्य दोष केवल तभी निर्मित होता है जब कोई ग्रह दूसरे ग्रह अथवा भाव पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करता है। यदि कुंडली में ग्रहों के बीच स्वस्थ संतुलन है, तो वश्य दोष निर्मित नहीं होता।
यह एक और सामान्य भ्रांति है कि वश्य दोष का अर्थ है वैवाहिक जीवन में समस्याएं। वास्तव में, वश्य दोष का प्रभाव व्यक्ति के व्यवहार, करियर तथा स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है। वैवाहिक जीवन में समस्याएं केवल तभी उत्पन्न होती हैं जब वश्य दोष 7वें भाव अथवा उसके स्वामी पर प्रभाव डाल रहा हो।
यह एक सामान्य भ्रांति है कि वश्य दोष को दूर करने के लिए केवल मंत्र जाप पर्याप्त है। वास्तव में, वश्य दोष को दूर करने के लिए व्यक्ति को अपने व्यवहार में सुधार करना चाहिए तथा धार्मिक अनुष्ठानों का पालन करना चाहिए। केवल मंत्र जाप से वश्य दोष के कुप्रभावों में कमी नहीं आती।
वश्य दोष निम्नलिखित स्थितियों में महत्वपूर्ण होता है:
वश्य दोष निम्नलिखित स्थितियों में महत्वपूर्ण नहीं होता:
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