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वृश्चिक और वृश्चिक राशि के बीच कुंडली मिलान का विश्लेषण करें और जानें वृश्चिक वृश्चिक कुंडली मिलान के गुणों का मूल्यांकन।
जब वर और वधू दोनों की चंद्र राशि वृश्चिक हो, तो अष्टकूट में राशि से तय होने वाले सभी कूट पूरे अंक देते हैं: वर्ण 1, ग्रह मैत्री 5 और भकूट 7, कुल 13 अंक। दोनों का स्वामी मंगल है, तत्व जल है और वर्ण ब्राह्मण है। बाकी कूट, यानी तारा, योनि, गण और नाड़ी, दोनों के जन्म नक्षत्र से तय होते हैं, इसलिए अंतिम तस्वीर वहीं से साफ़ होती है।
कुंडली मिलान वर-वधू की जन्म कुंडलियों की तुलना है। हिंदू विवाह में इसे इसलिए महत्व मिला है कि विवाह को दो व्यक्तियों का ही नहीं, दो स्वभावों और दो जीवन-धाराओं का मेल माना गया है। मिलान से पहले ही दिख जाता है कि कहाँ सहज तालमेल रहेगा और कहाँ थोड़ी सावधानी चाहिए।
अष्टकूट में कुल 36 अंक होते हैं और आठ कूट अलग-अलग पहलू परखते हैं: वर्ण 1, वश्य 2, तारा 3, योनि 4, ग्रह मैत्री 5, गण 6, भकूट 7 और नाड़ी 8। यह जानना ज़रूरी है कि कौन-सा कूट राशि से तय होता है और कौन-सा नक्षत्र से।
शास्त्रीय विभाजन में वृश्चिक के नक्षत्र इस प्रकार बताए गए हैं: विशाखा का चौथा चरण, अनुराधा (3-20 अंश से 16-40 अंश तक) और ज्येष्ठा (16-40 अंश से 30-00 अंश तक) (BPHS-Santhanam 46.8)। जन्म नक्षत्र जानने के लिए सही जन्म समय ज़रूरी है, क्योंकि चंद्रमा लगभग सवा दो दिन में एक राशि पार करता है।
राशि से तय होने वाले तीन कूट इस जोड़ी में पूरे अंक देते हैं: वर्ण 1 + ग्रह मैत्री 5 + भकूट 7, कुल 13 अंक। तारा, योनि, गण और नाड़ी दोनों के जन्म नक्षत्र से तय होंगे, इसलिए कुल अंक तभी बताया जा सकता है जब दोनों के जन्म नक्षत्र पता हों।
यानी वृश्चिक-वृश्चिक जोड़ी में राशि की ओर से शुरुआत बहुत मज़बूत है। अब निर्णायक बात यह है कि दोनों के नक्षत्र क्या हैं।
भकूट तब बिगड़ता है जब दोनों राशियाँ एक-दूसरे से 2/12, 5/9 या 6/8 के संबंध में हों। वृश्चिक-वृश्चिक में दोनों राशियाँ एक ही हैं, यानी 1/1 का संबंध है। इसलिए भकूट के पूरे 7 अंक मिलते हैं और भकूट दोष बनता ही नहीं।
इस जोड़ी में परिहार की ज़रूरत भी नहीं पड़ती, क्योंकि दोष है ही नहीं। फिर भी जानकारी के लिए: कई परंपराओं में जब दोनों राशियों का स्वामी एक ही ग्रह हो या वे आपस में मित्र हों, तो भकूट दोष कट जाता है। यहाँ तो स्वामी एक ही है, यानी मंगल।
ऊपर का लेख सामान्य स्थिति का है। आपकी कुंडली अलग है: विवाह का समय, रिश्ते, जो भी पूछना चाहें।
अपनी कुंडली मुफ़्त देखें →नाड़ी दोष राशि से नहीं, जन्म नक्षत्र से तय होता है। यह तब बनता है जब वर और वधू दोनों की नाड़ी एक ही हो। इसलिए वृश्चिक-वृश्चिक जोड़ी में नाड़ी दोष है या नहीं, यह दोनों के जन्म नक्षत्र जाने बिना नहीं कहा जा सकता। वृश्चिक के तीन नक्षत्र हैं, इसलिए दोनों के नक्षत्र अलग हुए तो नाड़ी भिन्न हो सकती है, और एक ही नक्षत्र या एक ही नाड़ी वाले नक्षत्र हुए तो दोष बनेगा।
नाड़ी के 8 अंक अष्टकूट में सबसे अधिक हैं, इसलिए इसे सबसे पहले जाँचना चाहिए। यदि दोनों की नाड़ी एक निकले, तो शास्त्रीय परंपरा में परिहार देखे जाते हैं, जिनकी चर्चा नीचे उपायों वाले खंड में है।
दोनों का तत्व जल है और स्वामी मंगल। जल तत्व गहरी भावनाओं, संवेदनशीलता और अंतर्ज्ञान का प्रतीक है, जबकि मंगल ऊर्जा, इच्छाशक्ति और तीव्रता देता है। दो वृश्चिक एक-दूसरे को बिना शब्दों के समझ सकते हैं, क्योंकि दोनों की भावनात्मक भाषा एक है।
राशि के आधार पर यह जोड़ी मज़बूत नींव लेकर चलती है: भकूट दोष नहीं, ग्रह मैत्री पूरी और वर्ण-वश्य का मेल। लंबे वैवाहिक जीवन के लिए यह अच्छा संकेत है, पर अकेला निर्णायक नहीं। असली तस्वीर तब बनती है जब नक्षत्र से तय चारों कूट, यानी तारा, योनि, गण और नाड़ी, जाँचे जाएँ।
इसके अलावा दोनों कुंडलियों में सप्तम भाव, उसके स्वामी, मंगल की स्थिति और चल रही दशाएँ भी विवाह की स्थिरता पर असर डालती हैं। इसलिए केवल राशि मिलान पर निर्भर न रहकर पूरी कुंडली देखना उचित है।
राशि वाले कूट पूरे अंक देते हैं, इसलिए स्कोर कम होने की संभावना केवल नक्षत्र वाले कूटों से आ सकती है। सबसे ज़्यादा ध्यान नाड़ी पर देना चाहिए।
राशि के लिहाज़ से यह जोड़ी मज़बूत है: दोनों का स्वामी मंगल, तत्व जल और वर्ण ब्राह्मण है। राशि वाले कूटों से 15 अंक पक्के मिलते हैं। अंतिम निष्कर्ष के लिए दोनों के जन्म नक्षत्र और पूरी कुंडली देखनी होगी।
नहीं। दोनों राशियाँ एक ही हैं, इसलिए संबंध 1/1 का है और भकूट के पूरे 7 अंक मिलते हैं। भकूट दोष केवल 2/12, 5/9 या 6/8 के संबंध में बनता है।
नाड़ी दोष तब बनता है जब वर और वधू दोनों की नाड़ी एक ही हो। नाड़ी जन्म नक्षत्र से तय होती है, राशि से नहीं, इसलिए वृश्चिक-वृश्चिक में इसका निर्णय दोनों के नक्षत्र जानकर ही हो सकता है।
दोनों का स्वामी एक ही ग्रह मंगल है, इसलिए ग्रह मैत्री के पूरे 5 अंक मिलते हैं। यह मानसिक तालमेल और सोच की समानता का संकेत है।
वश्य चंद्र राशि से तय होता है और वृश्चिक का वश्य समूह कीट है। दोनों का समूह एक ही होने से इस जोड़ी में 2 में से 2 अंक मिलते हैं।
मांगलिक दोष अष्टकूट का हिस्सा नहीं है, उसे दोनों कुंडलियों में मंगल की भाव-स्थिति से अलग जाँचा जाता है। यदि दोनों मांगलिक हों तो परंपरा में इसे संतुलित माना जाता है। इसके लिए किसी जानकार से पूरी कुंडली दिखवाना उचित है।
व्यवहार में अधिक अंक बेहतर माने जाते हैं, पर अंक अकेले निर्णायक नहीं हैं। नाड़ी और भकूट जैसे बड़े कूटों का दोष रहित होना, और सप्तम भाव व दशाओं का अनुकूल होना, कुल संख्या से ज़्यादा मायने रखता है।
एक ही नक्षत्र होने पर नाड़ी एक ही होगी, इसलिए नाड़ी दोष की संभावना बनती है। परंपरा में कुछ स्थितियों में, जैसे चरण भिन्न होने पर, इसका परिहार माना गया है, पर इसे पूरी कुंडली देखकर ही तय करना चाहिए।
सही जन्म तिथि, समय और स्थान। चंद्रमा लगभग सवा दो दिन में एक राशि पार करता है, इसलिए समय में थोड़ा अंतर भी नक्षत्र या चरण बदल सकता है। इसलिए कुंडली बनवाते समय जन्म समय जितना सटीक हो, उतना बेहतर।
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