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मेष और सिंह राशि के बीच कुंडली मिलान में अष्टकूट विश्लेषण किया जाता है, जिसमें वर्ण, वश्य, तारा, योनि, ग्रह मैत्री जैसे कूटों का विश्लेषण होता है।
मेष और सिंह की जोड़ी अग्नि तत्व की जोड़ी है। मेष का स्वामी मंगल और सिंह का स्वामी सूर्य है, और दोनों ग्रह आपस में मित्र हैं, इसलिए ग्रह मैत्री में पूरे 5 में से 5 अंक मिलते हैं। नीचे अष्टकूट की हर बात इसी जोड़ी के हिसाब से समझाई गई है, और जो बात सिर्फ़ जन्म नक्षत्र से तय होती है, वह वहीं बताई गई है।
कुंडली मिलान दो लोगों की जन्म कुंडलियों को साथ रखकर देखने की विधि है। इसमें देखा जाता है कि दोनों का स्वभाव, मन और जीवन की दिशा कितनी मेल खाती है। हिंदू विवाह में इसे इसलिए अहमियत मिली कि शादी दो परिवारों और लंबे साथ का फ़ैसला है।
यह मिलान दोनों कुंडलियों के कुल आकलन का एक हिस्सा है। अष्टकूट के अंक दिशा बताते हैं, पर पूरी तस्वीर कुंडली के ग्रह, दशा और भाव मिलकर बनाते हैं।
अष्टकूट में आठ कूट हैं और कुल 36 अंक बनते हैं। हर कूट जीवन के एक अलग पहलू को परखता है, जैसे स्वभाव, मानसिक तालमेल, संतान और स्वास्थ्य का पक्ष।
आठ कूटों में कुछ राशि से तय होते हैं और कुछ जन्म नक्षत्र से। इसी फ़र्क़ को समझना इस जोड़ी को ठीक से पढ़ने की कुंजी है।
मेष राशि के नक्षत्र अश्विनी, भरणी और कृत्तिका (पहला चरण) हैं, जैसा कि बृहत् पाराशर होरा शास्त्र में नक्षत्र-विभाग में दिया गया है (BPHS 46.1)। यही बात दिखाती है कि एक राशि के भीतर भी नक्षत्र अलग-अलग होते हैं, और उन्हीं से योनि, गण और नाड़ी बदल जाते हैं।
राशि से तय होने वाले कूटों का हिसाब यह है:
वश्य के बारे में ऊपर बताया जा चुका है: मेष राशि वर की हो तो 0 अंक, और सिंह राशि वर की हो तो कोई संख्या तय नहीं।
तारा, योनि, गण और नाड़ी के अंक दोनों के जन्म नक्षत्र मिलने पर ही निकलेंगे। इसलिए इस जोड़ी का 36 में से कुल अंक अभी नहीं बताया जा सकता। कुल अंक जानने के लिए दोनों का जन्म नक्षत्र चाहिए।
भकूट में दो राशियों की आपसी दूरी देखी जाती है। 2/12, 5/9 और 6/8 के संबंध पर 0 अंक मिलते हैं और बाकी पर 7। मेष-सिंह का संबंध 5/9 का है, इसलिए यहाँ भकूट दोष बनता है।
कई परंपराओं में भकूट दोष तब कट जाता है जब दोनों राशियों का स्वामी एक ही ग्रह हो या दोनों राशियों के स्वामी आपस में मित्र हों। इस जोड़ी में यह शर्त पूरी होती है, क्योंकि मंगल और सूर्य मित्र हैं। इसलिए इस जोड़ी में भकूट दोष का परिहार माना जाता है।
फिर भी परिहार का मतलब यह नहीं कि 0 अंक अपने आप बदल गए। ज्योतिषी इसे दोष का शमन मानकर आगे कुंडली के बाकी पक्ष देखते हैं।
ऊपर का लेख सामान्य स्थिति का है। आपकी कुंडली अलग है: विवाह का समय, रिश्ते, जो भी पूछना चाहें।
अपनी कुंडली मुफ़्त देखें →नाड़ी जन्म नक्षत्र से तय होती है, राशि से नहीं। इसलिए मेष और सिंह को कोई एक नाड़ी नहीं दी जा सकती। नाड़ी दोष तब बनता है जब दोनों की नाड़ी एक ही हो। इसे नक्षत्र जानकर ही जाँचा जाता है।
अगर दोनों की नाड़ी अलग निकले तो नाड़ी के पूरे 8 अंक मिलते हैं और यह चिंता का विषय नहीं रहता। एक ही निकले तो शास्त्र में कुछ परिहार माने गए हैं, जैसे दोनों का जन्म एक ही राशि में पर अलग नक्षत्र में होना। इसका फ़ैसला पूरी कुंडली देखकर ही होता है।
अग्नि तत्व की दोनों राशियाँ ऊर्जा और पहल में एक-दूसरे को समझती हैं। मेष का मंगल साहस और फुर्ती देता है, और सिंह का सूर्य आत्मविश्वास और नेतृत्व। दोनों को सम्मान और अपनी बात की क़द्र चाहिए, इसलिए जब दोनों एक-दूसरे का मान रखते हैं तो साथ बहुत ऊर्जावान हो जाता है।
जोखिम यह है कि दोनों ही आगे रहना चाहते हैं। तब छोटी बात पर तेज़ बहस हो सकती है। दोनों का गुस्सा जल्दी भड़कता है और जल्दी उतर भी जाता है, पर शब्द दिल पर रह जाते हैं।
ग्रह मैत्री के पूरे अंक इस रिश्ते को एक ठोस आधार देते हैं, क्योंकि मंगल और सूर्य का मित्र-भाव मन और सोच के मेल का संकेत है। भकूट का 0 अंक और उसका परिहार बताता है कि यह जोड़ी बिना देखे-परखे नहीं छोड़ी जा सकती।
लंबे साथ के लिए असली तस्वीर दोनों कुंडलियों के सप्तम भाव, दशा और गोचर से बनती है। अकेला अष्टकूट इसका फ़ैसला नहीं करता।
इस जोड़ी में सबसे पहले भकूट के परिहार को देखा जाता है, जो यहाँ बनता है। इसके बाद दोनों कुंडलियों में मंगल, सूर्य और सप्तमेश की स्थिति जाँची जाती है।
उपाय इसके बाद आते हैं। मंगल के लिए मंगलवार को हनुमान जी का पाठ और सूर्य के लिए प्रातः सूर्य को जल देना सामान्य, सरल उपाय माने जाते हैं। ये मन को स्थिर रखने में मदद करते हैं।
दोनों अग्नि राशियाँ हैं और मंगल-सूर्य आपस में मित्र हैं, इसलिए ग्रह मैत्री के पूरे 5 अंक मिलते हैं। स्वभाव का मेल अच्छा है, पर दोनों के जिद्दी होने से टकराव भी हो सकता है। पूरा फल जन्म नक्षत्र और कुंडली देखकर ही तय होता है।
सिंह राशि मेष से 5वीं है और मेष राशि सिंह से 9वीं, यानी 5/9 का संबंध। इस पर भकूट के 0 अंक मिलते हैं, इसलिए दोष माना जाता है। पर दोनों राशियों के स्वामी मंगल और सूर्य मित्र हैं, इसलिए कई परंपराओं में इसका परिहार हो जाता है।
कई परंपराओं में परिहार तब लगता है जब दोनों राशियों का स्वामी एक ही ग्रह हो या दोनों के स्वामी आपस में मित्र हों। मेष-सिंह में स्वामी मंगल और सूर्य मित्र हैं, इसलिए यह शर्त पूरी होती है।
अष्टकूट में कुल 36 अंक होते हैं। इस जोड़ी का कुल अंक तभी निकलेगा जब दोनों के जन्म नक्षत्र मालूम हों, क्योंकि तारा, योनि, गण और नाड़ी उन्हीं से तय होते हैं। सिर्फ़ राशि जानकर कुल संख्या नहीं बताई जा सकती।
नाड़ी राशि से नहीं, जन्म नक्षत्र से तय होती है। दोष तब बनता है जब दोनों की नाड़ी एक ही हो। इसलिए दोनों के नक्षत्र देखे बिना इसका जवाब नहीं दिया जा सकता।
दोनों के मांगलिक होने पर आपस में संतुलन माना जाता है, इसलिए इसे अक्सर अच्छा संकेत गिना जाता है। मंगल की ठीक स्थिति दोनों कुंडलियों में देखनी होती है। किसी जानकार ज्योतिषी से पूरी कुंडली दिखाना बेहतर है।
वश्य चंद्र राशि से तय होता है। मेष चतुष्पद समूह में है और सिंह वनचर समूह में। मेष राशि वर की हो तो 2 में से 0 अंक मिलते हैं। सिंह राशि वर की हो तो इस संयोजन का कोई एक पक्का अंक प्रचलित तालिकाओं में नहीं मिलता।
नहीं। अष्टकूट सिर्फ़ एक पैमाना है। भकूट जैसे दोष के परिहार, दोनों के मंगल की स्थिति और सप्तम भाव को देखकर ही फ़ैसला लेना चाहिए। एक अंक-तालिका के भरोसे रिश्ता तोड़ना ठीक नहीं।
सबसे बड़ी चुनौती अहं का टकराव है, क्योंकि दोनों आगे रहना चाहते हैं। गुस्सा जल्दी आता है और उतर भी जाता है। एक-दूसरे को बोलने और सम्मान देने की आदत से यह संभल जाता है।
आपकी सटीक जन्म कुंडली और मुफ़्त रीडिंग, तुरंत। फिर अपने सवाल पूछें — 3 मिनट मुफ़्त, पूरा 20-मिनट का परामर्श ₹49 में।
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